राजनीतिक परिवारों से सही प्रश्न पूछने का समय

चुनाव पूरे देश में कहीं भी हो रहे हों, उनमें गाहे-बगाहे जम्मू-कश्मीर की चर्चा हो ही जाती है। 2019 में हो रहे लोकसभा चुनाव में भी जम्मू-कश्मीर से जुड़े मुद्दे मीडिया में अपना स्थान बना ही रहे हैं। इन चुनावों में जम्मू-कश्मीर पर राजनीतिक बयानबाजी, विमर्श और उस पर मीडिया के दृष्टिकोण का विश्लेषण आवश्यक है। इससे न केवल राजनीतिक दलों और उनसे संबंधित लोगों के दृष्टिकोण का पता चलता है, बल्कि मीडिया इस विमर्श को किस ओर ले जाने का प्रयास कर रहा है, इसका आंकलन भी हम कर सकते हैं। जम्मू-कश्मीर में पिछले 70 वर्षों से कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों और उनके करीबी लोगों की ही सरकारें रही हैं। वैसे तो राज्य के तीन संभाग हैं जम्मू, कश्मीर और लद्दाख, लेकिन सत्ता हमेशा से ही कश्मीर केंद्रित दलों के पास ही रही है। इसका कारण भी यही है कि अन्य दो संभागों जम्मू और लद्दाख से कोई मजबूत राजनीतिक दल खड़ा ही नहीं हो पाया।
हालांकि 1947 में कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस को टक्कर देने के लिए जम्मू में प्रजा परिषद अस्तित्व में आई थी। प्रजा परिषद की शक्ति और स्वरूप को देखकर शेख अब्दुल्ला और उनकी पार्टी ने सारे सरकारी एवं गैर सरकारी तंत्रों का उपयोग करके उसे समाप्त करने का काम किया। राज्य में पहले चुनावों में प्रजा परिषद के सारे नामांकन रद्द करके शेख की नेशनल कॉंन्फ्रेंस को निर्विरोध ही चुनाव जीत गई। उसके बाद शेख ने किसी अन्य दल को राज्य में खड़ा ही नहीं होने दिया और कांग्रेस के सहयोग से राज्य में निर्विरोध राज किया।
समय के साथ दिल्ली की कांग्रेस सरकार को भी अहसास हुआ कि कश्मीर में नेशनल कॉंन्फ्रेंस और शेख के रूप में उन्होंने भस्मासुर को जन्म दिया है। जो समय के साथ भारत विरोधी राग अलापने लगा था और निर्विरोध शासक होने के कारण भारत को ब्लैकमेल कर अपने सारे काम कुशलता से कराने लगा था। फिर कांग्रेस ने राज्य में एक और राजनीतिक दल खड़ा किया जो कि पुनः कश्मीर घाटी से ही था। मुफ्ती मुहम्मद सईद की पीडीपी यह नया राजनीतिक दल था, जो शेख की एनसी को चुनौती देने के लिए खड़ा किया गया था। मीडिया और कांग्रेस के सहयोग या लाचारी से जम्मू-कश्मीर में कश्मीर केंद्रित दल और अलगाववादी इतने प्रभावशाली और ताकतवर हो गए कि देश-विदेश में राज्य का पूरा विमर्श उन्होंने खड़ा किया। पूरा देश और विश्व जम्मू-कश्मीर के बारे में वही सुनता और पढ़ता था जो मुफ्ती परिवार की पीडीपी, शेख अब्दुल्ला परिवार की एनसी और अलगाववादी बोलते थे। राजनीतिक प्रतिनिधित्व न होने की वजह से जम्मू और लद्दाख तो जबरदस्ती इस विमर्श का हिस्सा बनते गए। इन दोनों परिवारों ने कश्मीर में भी किसी आम कश्मीरी को राजनीति में नहीं आने दिया, तो जम्मू और लद्दाख तो दूर की बात थे। राज्य के विकास के लिए जो भी संसाधन एवं धन राज्य को दिल्ली से मिलता था, वह भी सीधा इन परिवारों और अलगाववादियों के पास जाता था और कुछ हिस्सा कश्मीर को मिल जाता था। जम्मू और लद्दाख यहां भी भाग्यहीन रहे। उनके द्वारा अपने स्थानों से चुने हुए प्रतिनिधि भी अपने कश्मीरी हुकमरानों के अधीन थे। 2014 में पहली बार राज्य में यह कश्मीरी आधिपत्य हिला, जब लोकसभा चुनाव में पहली बार राज्य की आधी सीटें यानि की कश्मीर की तीन सीटें छोड़कर जम्मू और लद्दाख की तीनों सीटें भाजपा को मिली। इन चुनावों में अब्दुल्ला परिवार की एनसी और कांग्रेस को राज्य की जनता ने पूरी तरह से नकार दिया। उसके बाद प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भी जम्मू संभाग ने भाजपा और कश्मीर ने मुफ्ती परिवार की पीडीपी को चुना। केंद्र के साथ-साथ अब भाजपा राज्य में भी गठबंधन के साथ सरकार में आ गई। पहली बार राज्य में एनसी, पीडीपी और कांग्रेस की जड़ें और कश्मीर का आधिपत्य हिला।
गत पांच वर्षों में राज्य में तीनों संभागों को बराबर संसाधन मिले। पहली बार संसाधनों और संस्थानों के आवंटन में जम्मू और लद्दाख को कश्मीर से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं मिला। देश को तोड़ने का सपना देखने वाले अलगाववादियों को राज्य का प्रतिनिधि मानने से ही इन्कार कर दिया गया। पांच वर्षों में न ही उनसे कोई बात की गई और न ही उन्हे कोई मंच दिया गया। कश्मीर घाटी में आतंकवाद परोसने वाले पाकिस्तान से आतंकवाद रोकने की बात तक करने से मना कर दिया गया और जम्मू-कश्मीर से संबंधित कोई बात यदि हागी तो वह पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर को लेकर होगी, ऐसा स्पष्ट संदेश दिया गया। सुरक्षा बलों द्वारा आतंकियों का सफाया और घाटी से पत्थरबाजों का गायब हो जाना बहुत कुछ बताता है। कुल मिलाकर कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों, अलगाववादियों और मीडिया द्वारा इतने वर्षों में जो विमर्श खड़ा किया गया, वह अब डगमगाने लगा है।
अस्तित्व के इस खतरे को भांपते हुए, राज्य में एक-दूसरे के धुर विरोधी दल एक साथ आ गए हैं। जम्मू लोकसभा सीट से भाजपा के विरोध में राज्य के दो प्रमुख दलों एनसी और पीडीपी ने अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारा और दोनों दल कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। वहीं बाकी क्षेत्रों में भी कांग्रेस और एनसी मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं और अपनी सुविधा अनुसार जहां आवश्यक है, वहां पीडीपी का भी अंदर खाते समर्थन करने से नहीं चूक रहे। इन सभी दलों की बौखलाहट एक ही है कि केवल पांच वर्षों में ही इतने वर्षों का खड़ा किया विमर्श ढह गया। यदि एक बार और सत्ता से चूक गए तो अस्तित्व ही खत्म न हो जाए। विशेष राज्य होने का झूठा प्रपंच रच के इतने वर्ष यह दल दिल्ली को ठगते रहे और अपने जेब भरते रहे। देश की मीडिया ने भी कभी विशेष राज्य होने के इनके झूठे दावे को खारिज करना तो दूर प्रश्न भी नहीं किया। इस बार पुनः मीडिया की भूमिका बहुत नकारात्मक रही।
अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जब इस बार एनसी के उमर अब्दुल्ला, उनके पिता फारुक अब्दुल्ला द्वारा और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती द्वारा यह बयान दिए गए की यदि राज्य से अनुच्छेद 35ए और 370 हटा दिया गया तो कोई तिरंगा उठाने वाला नहीं बचेगा, पूरे राज्य में आग लग जाएगी, राज्य भारत से अलग हो जाएगा। तब किसी जिम्मेदार मीडिया ने उनके इन दावों के आधार को लेकर प्रश्न नहीं किया। आखिर 35ए और 370 के राज्य के भारत से अधिमिलन से क्या संबंध है? राज्य का भारत में अधिमिलन महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्तूबर 1947 को किया। अनुच्छेद 370, 1949 में आया और 35ए राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा भारत के संविधान में 1954 में एक नया अनुच्छेद जोड़ दिया गया। तो इन दोनों का राज्य के अधिमिलन से क्या संबंध, यह साधारण सा प्रश्न भी मीडिया इन परिवारों से नहीं पूछ पाई। जहां तक रही राज्य में आग लगने और तिरंगा न उठाने वाली बात, तो मीडिया को पूछना चाहिए था कि राज्य में जम्मू और लद्दाख में कौन आपके इस विचार का समर्थन करता है? हां बात कश्मीर की तो वहां भी अलगाववादी विचार का समर्थन करने वाले लोग अब ढूंढने पर ही मिलते हैं, तो आप आग किससे लगवाना चाहते हैं?

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