भाव का अंतःसंवाद

किसी चित्र अथवा मूर्ति को देखते हुए हमारे ऊपर सबसे ज्यादा प्रभाव किस चीज का पड़ता है? उकेरे गये रूपाकारों में उसका यथार्थ अथवा रंग? दर्शक पर सबसे ज्यादा प्रभाव उस कृति में व्यक्त भाव का पड़ता है जो हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। आप आकारों का अभ्यास कर सकते हैं, माध्यमों में तकनीक सीख सकते हैं लेकिन कृति की आत्मा उसका भाव है। यह अमूर्त होता है। इसे पढ़ा नहीं जाता बल्कि स्वयं होना होता है। यह तत्व सरल है, स्वयं में अनुभूत करने पर। यह मालूम पड़ता है स्वचिंतन से और घटित होता रहता है। यह इन्द्रिय जनित है, परन्तु कठिन होता जाता है व्यक्त करने में, मुश्किल हो जाता है किसी रूप के साथ ढ़ालने पर, जीवन-पर्यंत की तपस्या हो जाती है जो स्वयं घटित हुआ था। क्योंकि यह भाव है, अमूर्त है, एक तरंग है जो प्रतीत होती है परन्तु देख नहीं सकते। देख भी सकते हैं तो किन्ही समय दशाओं में जैसे दुःख का नाम आते ही आप गिरते हुए अश्रु या कराहता मुखमण्डल महसूस करते हैं।
इन्द्रियों की अंतः संचालिका वृत्ति भाव ही है। पूरे जीवन क्रम में भावों की ही निष्पति होती है। चूंकि कला अभिव्यक्ति है जीवन की अतः जीवन के लक्षणों की पुनरावृत्ति होती है। यह कलाकार की साधना का अहम बिंदु है। हमारे जीवनचर्या में, लोक में सबसे पहले भाव की ही प्रतिष्ठा की गई है। बहुत साधारण अर्थों में जीवन का मर्म समझा दिया जाता है कि जैसा भाव होगा वैसी प्राप्ति, अर्थात जो बनाना चाहते हो, जैसा गढ़ना चाहते हैं वह बाहर नहीं है बल्कि वह आपके भीतर ही है। कलाकार जो भी गढ़ता है, उसका रचना संसार उसके अंदर के भावों का विस्तार होता है। यहां एक भ्रम खड़ा होगा आपके सामने यदि उसका रचना संसार केवल उसका अपना है तो यह कितना सच है? क्योंकि उसके अन्दर का मनोभाव भी तो प्रतिपल परिवर्तित हो रहा है। यहां परिवर्तन का कारण प्रकृति भी है। तो इतने रूपों के रच जाने के बाद भी भाव, अछोर सागर की भांति अथाह रह जाता है। यदि हम अपने भावानुसार ही कृतियों को देखते है तब तो और भी उलझन है क्योंकि हम ही हम को देखते हैं तो वह कहां देखा जो रचनाकार ने देखा-

जाकी रही भावना जैसी
प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी।

कला के षडंग सिद्धांत में भाव बहुत व्यापक अवधारणा है। यह मनोविज्ञान का सूक्ष्म विषय हो सकता है परन्तु भारतीय कला दर्शन में बहुत गहरे अर्थ रखता है। षडंग सिद्धांत में यह तीसरे सोपान पर आता है। रूपभेद और प्रमाण के बाद। इस स्तर पर वह अपने ही मनोभावों का परीक्षण करता रहता है। बहुत ही तटस्थ होकर प्रकृति के कार्य-व्यापार, प्राणियों के व्यवहार को देखता है। प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होती मानसिक क्रियाओं को गुनता रहता है। प्रकृतिस्थ हो स्वयं के विचार-अवसाद, प्रेम, आदि को बाहरी रूपों में संधान की कोशिश करता है। यह प्रक्रिया निहायत ही निजी होती है। इसी कारण कलाकार किसी विशेष वैचारिकी में बँध कर नहीं रहता। उसके भावों का सच्चा प्रतिरूप जहां प्रतीत होता है वहां कुछ रचने लगता है। अलग अर्थों में उसका जीवन भावों का रूप संधान हो जाता है। जब वो भाव ही माया प्रकृति हो तो कितना कठिन हो जाता है इस मानवी शरीर से किसी शारीरिकी, किसी रूपाकार में उस अमूर्त, अव्यक्त को बांधना। वह तो सुन्दर है, रमणीय है किंतु क्षण-क्षण में नवीनता धारण करता है- ‘क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयताः’
कला में यह साध्य विषय है। आकारादि का अभ्यास एक तरह से कंकाल है और भाव उसका प्राण है। किसी चित्र में अंकित विषय-वस्तु ही नहीं चलते बल्कि उस चित्रित रूपाकारों में जीवन के सारे गतिमान लक्षण होते हैं। उनकी मुद्राएं किन्ही प्रकारों में ही संयोजित रहती हैं। उन आकारों की विशिष्ट मुद्राएं विशेष भावों का वहन करती हैं। इसी क्रम में रचनाकार अपनी कल्पनाओं से नए भावों की संरचना करता है। उदाहरणस्वरूप आधुनिक कला में विशिष्ट भाव मुद्रा के निरूपण का अद्भुत शक्तिशाली चित्रण मिलता है तैयब मेहता की कृति ‘महिषासुरमर्दिनी’ में। इसमे देवी को चित्रित किये जाने की वो परंपरागत छवि नहीं है ना ही उस रूप में महिषासुर ही है लेकिन सर्वथा अलग तरह का भाव-बोध इस चित्र में दिखायी पडता है। यह कलाकार की अपनी निजी यात्रा है उस रूप में भाव प्राप्ति का। इस चित्र में देवी का जनमानस में बसा आराध्य स्वरूप नहीं है बल्कि रेखाओं का कोणीय संयोजन है आकार में। सपाट रंगों से आकृति उभरती है। देवी की मुखाकृति बड़ी ही सपाट है किन्तु दो लाइनों में त्रिनेत्र, आंखे तथा हाथों में एक पतला तीर जो लाइन के तेज स्ट्रोक में है जिसमें तीक्ष्णता है। नीचे महिष की उलटी आँँखेंं और बगल से उठा एक हाथ रोकता हुआ जो यथार्थ शरीर रूप में नहीं है। पूरे चित्र में भावों के नये आयाम बनते हैं वरना तो यह वो आराध्य स्वरूप नहीं है जो आम जनमानस पूजता है। साधारणतया भारतीय जनआस्था अधिक बुद्धि के फेर में नहीं पड़ती। वह तो कोई माटी का माधो बना के रीझ पड़ता है। नदी से लाये गोल अण्डाकार पत्थर को कपड़े में लपेट कर सुला देता है, चन्दन आदि से पूजित शालिग्राम बना देता है। उसके लिए भाव प्रधान है-

‘न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्’।।


-आचार्य चाणक्य
अर्थात ईश्वर न काष्ठ (लकड़ी) में है, न पत्थर में और न ही मिट्टी में अथवा मूर्ति में। वह केवल भाव में रहता है। अतः भाव ही मुख्य है।
यहाँँ सवाल उठता है यदि लोकमानस इतना सहज है कि वो केवल भाव देखता है तो नवबोध से रची किसी कृति में अपने आराध्य को देखकर असहज क्यों हो जाता है? जैसे एम. एफ. हुसैन के चित्र सरस्वती पर लोग क्यों बिफर पड़े? आमजन आस्था के स्वरूप पर चिढ़ क्यों जाता है? क्योंकि किसी रूपाकार को आराध्य बनने में केवल आकार-प्रकार या मुद्राएं ही नहीं होती है बल्कि भावों की शुद्ध साधना है जो लम्बे चिन्तन और रूप साधना का प्रतिफल होता है। इसका सुन्दर उदाहरण बुद्ध प्रतिमा निर्माण में दिखाई पड़ता है। वर्तमान में जो रूप सारनाथ म्यूजियम में संरक्षित मूर्ति में हमें मिलता है, उसे प्राप्त होने में कितने ही कलाकारों की पीढ़ियाँँ तिरोहित हो गई उस भाव सत्व को रूप में ढ़ालते-ढ़ालते, समय के इतने अन्तराल के बाद वो रूप मिला जो धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में पाया जाता है। अब उस रूप को चीवररहित नग्न की तरह प्रस्तुत किया जाए तो क्या यह आधुनिक बोध है?
भारतीय संदर्भ में केवल कला ही साध्य नहीं होती बल्कि उससे कहीं ज्यादा कसौटी कलाकार की होती है। उसका जीवन अनुक्रम होता है क्योंकि शरीर ही साधन है, कृति के प्रतिफलन का। इन्द्रियों के भाव-विभाव ही आपके चिन्तन की दिशा-दशा और दृष्टिबोध तय करते हैं। इसलिए हमारे यहां सर्जक होना इसी जीवन में होते हुए अलग आयाम पर होना होता है। यदि आयाम की शुचिता को वह धारण नहीं करता तो कितने ही सुन्दर चित्र बना ले, रूप गढ़ ले वह लोकमानस में स्थान नहीं पा सकता, वो तथाकथित आधुनिक कलाकार बन सकता है, करोड़ में बिक कर किसी की शोभा बन सकता है अथवा म्यूजियम में सज कर इतिहास की किताब में आ सकता है किन्तु भारतीय मनस में कोहबर की तरह, गौर-गणेश या शिव की पिण्डी की तरह सहज रूप बन पैठ नहीं सकता। यहां महत्व पूर्ण साध्य है भावों की शुद्ध प्राप्ति। अन्ततः किसी कला को लोक का हो जाना चाहिए। किसी म्यूजियम का होके हमेशा बड़ेपन के ऐंठ से क्यों भरा होना चाहिए? कलाकार के निजी हाथों से निकलकर समाज भूमि का हो जाना चाहिए।
संस्कृत के महाकवि भास के नाटक‘दूतवाक्यम’ में एक प्रसंग में वह लिखते हैं कि दुर्योधन ‘द्रोपदी चीरहरण’ का चित्र देखते हुए उसके भाव और रंगों की प्रशंसा करता है, ‘अहो!भावोपपन्नता' अहो! अस्य वर्णाढ़यता'। लगभग दूसरी शती रचित इस कृति से उस समय भी भाव के महत्व का पता चलता है। यह तत्व किसी भी रचना का मूल है। किसी घटना या दृश्य देखकर मन में कुछ उमड़ने-घुमड़ने लगता है, कहीं से कोई शब्द जुड़ जाता है, कोई आकार खींचते हैं तो सुदूर बचपन की देखी हुई आकृतियां उभरने लगती हैं। विह्वल क्षणों में गुनगुना उठते हैं। यह सब जो एकाएक घटित हो जाता है, भाव ही तो है जो बहने लगता है। भावों के सहज उच्छलन ने ही तो वाल्मिकि को आदिकवि बना दिया-

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः
यत्क्रौंंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।


सम्पूर्ण प्राणिजगत भावनाओं के बन्धन में बंधा हुआ है। क्या भावों के कई रूप हैं?क्या इन्हे बांटा जा सकता है? भाव अप्रत्यक्ष हवा सी है। जो सब में है लेकिन दिखाई नहीं पडता। तमाम स्वरूपों में दृष्टिगत होता है। भावविहीन कुछ भी नहीं हो सकता। यह बहुत जटिल है। परिभाषाएँँ और भेद बनाए जा सकते हैं परन्तु यह खुद में महसूस होता है। कला क्षेत्र में प्रायः दो धाराओं में भाव निष्पति देखी जा सकती है, आकृतिमूलक और आकृतिविहीन ।आकृतिमूलक विधान में हमारे चारों ओर घटित होने वाले जीवनसंदर्भों की ही पुर्नरचना होती है। उसमें रियलिस्टिक, हाइपर रियलिस्टिक, फोटो रियलिस्टिक होता है अर्थात हू-ब-हू वास्तविक या वस्तुगत चित्रण। कई कलाकार रूपों को वास्तविकता में रखते हैं जिन्हे आप आसानी से पहचान सकते हैं। आकृतिविहीन चित्रण में विविध रंगों, रेखाओं, आकार के बहुस्तरीय आयाम रचते हुए अपने भावों को उद्घाटित करते हैं। इस तरह की रचनाओं में समाकृति नहीं होती। आस-पास की देखी जानी हुई रूप, विघटित अथवा कई आकारों का एक-दूसरे में घुलता हुआ कई स्तर बनती है जो बिल्कुल अलग मनोभाव की सृष्टि करता है।
आकृतिमूलक या आकारविहीनता दोनों रूप का एक अभ्यास है। रेखांकन की विशेषज्ञता है। भाव दोनों के मूल में है। जिस तरह शरीर में श्वांस होना जीवित होने का प्रमाण है उसी तरह चित्र, मूर्ति में अंकन ऐसा हो जैसे वह सांस ले रहा हो, ‘सश्वास इव यच्चित्रम’। भरतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में सभी रसों के मूल में भाव की ही व्यंजना की है। मनुष्य भावों का पुतला है, हर क्षण, हर परिस्थिति में उसके अन्दर विचारों के चित्र बनते-बिगड़ते रहते हैं। आशा-निराशा, प्राप्ति-विछोह, उद्वेग, किलक-पुलक, प्रेम-घृणा आदि की असंख्य मनः स्थितियों को बिना रूपाकारों के व्यक्त करना असंभव है। रेखा, रंग, रूप, आकार ये सब साधन है, शरीर है भावों को व्यक्त करने का। भारतीय कला चिन्तन में प्राचीन काल से ही सरल भावांकन पर विशेष बल दिया गया है। अजंता-एलोरा या बाघ बादामी गुफा चित्र हों या लोक में विवाहादि, पूजन पर रचे जाने वाले या कोहवर, माण्डना, अल्पना या रंगोली अथवा बंगाल के कालीघाट के पटचित्र जिसका प्रभाव लेकर जामिनी रॉय ने अद्भुत चित्र रचे, सभी में भावपरकता सर्वोपरि है।
कोई सृजन, उसके देशकाल, चिन्तन परिवेश, उसके जीवन दर्शन के फलस्वरूप आकार ग्रहण करता है। इस नजरिये से भारत का जीवन चिन्तन आंतरिक से प्रकृति की ओर उद्घाटित करने का संधान है। यह खोज नित्य नवीन चुनौती के साथ हर व्यक्ति के सामने होता है। इसी संधान क्रम में हमारे देश में एक जीवन परम्परा का निर्माण हुआ। यह परंपरा बराबर प्रेरणा देती है, स्वयं से संवाद की। क्षेत्र चाहे कोई भी हो कला, साहित्य, वास्तु, संगीत, शिक्षा आदि। संवाद के इस क्रम में कलारूपों का निर्माण अधिक प्रभावी हो जाता है क्योंकि यह देखने की विशेष दृष्टि पैदा करता है भाषा से परे।
आधुनिकता के नाम पर चाहे ‘वाद’ के स्तर बना लें, चाहे कितने ही पढ़ने के तमगे टांक दिए जाएँँ लेकिन सवाल हर समय से और संवाद से युगानुरूप नए रूपों की सृष्टि का बोध पैदा होता है। ऐसे ही कलाबोध का रसग्राही समाज रूपाकारों को गढ़ता है। अब जबकि समाज बहुत हद तक व्यक्तिगत हो चला है, ऐसी जीवन परम्परा में व्यक्ति के सहयोग की जगह तकनीक ने ले ली है इसीलिए आज के कला परिदृश्य में आपको कलाकार पहले दिखेगा। उसकी अभिव्यक्ति में तकनीक की प्रधानता दिखेगी। भाव तो आपको स्वयं खोजना पड़ेगा। सृजित कलारूपों में जहां सर्व का होना चाहिए वहां कलाकार का अपना निजीपन अधिक होता जा रहा है।
व्यक्ति और समष्टि का द्वन्द्व पहले से रहा है। यह द्वन्द्व बहुत हद तक पश्चिम का रहा है जो आज हमें अधिक महसूस हो रहा है, जबकि भारतीय परिप्रेक्ष्य कभी इतने सीमित द्वन्द्व में नहीं रहा है। यहां तो अंंतर से प्रकृति की, जीव से ब्रह्म की यात्रा का सुचिन्तित सम्यक पथ है। यहां द्वन्द्व नहीं केवल साधना पथ है। सही-गलत का वाद नहीं बल्कि सत्-असत् का संवाद, विचार-विमर्श और शास्त्रार्थ है जो लोक जीवन परम्परा में अपनी-अपनी अहम् छोड़ तिरोहित हो जाता है। ऐसे ही लोकोत्तर भाव को समाज ग्रहण करता है, उसके रूपाकार को अपना बना लेता है। कला कलाकार को मुक्त कर देती है, उसके ही रूप बन्धन से।

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