लोकजीवन पर पंडित लखमीचंद की रागनियों और सांग का प्रभाव

लोककलाओं की यह विशेषता होती है कि वे आम समाज से उसके ही शब्दों, ठेठ भावों और आसपास के उदाहरणों के जरिए ही संवाद करती हैं। ‘कोस कोस पर पानी बदले और चार कोस पर वाणी’ की कहावत वाले भारत में लोककलाएं भी खासी विविधता लिए हुए हैं। लेकिन, यह अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में आम समाज का मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि जीवन के कठिन पहलुओं को सहज शब्दों में पिरोकर सीख भी देती हैं। ऐसी ही लोककला हरियाणा की सांग और रागनी भी है।
रागनी और सांग के सबसे बड़े कलाकार और गायक पंडित लखमीचंद माने जाते हैं। उन्हें हरियाणवी संगीत और सांग का सूर्यकवि कहा जाता है। हरियाणा के शेक्सपियर की उपाधि भी उन्हें दी जाती है। हरियाणवी साहित्य में योगदान देने वाले कलाकारों को प्रत्येक वर्ष हरियाणा कला अकदमी की ओर से पंडित लखमीचंद अवॉर्ड दिया जाता है। 1903 में जन्मे लखमीचंद महज 42 साल की आयु में ही दुनिया छोड़ गए, लेकिन आज भी उनके द्वारा रचित सांग और रागनी हरियाणा ही नहीं बल्कि राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश तक में लोकप्रिय हैं। उनकी रागनियां मनोरंजन का सरस माध्यम तो हैं ही बल्कि उनके जाने के करीब 85 साल बाद भी लोगों को नीति और धर्म का ज्ञान देती हैं।
उन्होंने भारत के मौलिक ज्ञान के स्रोत कहे जाने वाले पौराणिक किस्सों और कहानियों को सांग और रागनी के माध्यम से जन-जन तक हरियाणवी भाषा में पहुंचाया। हरियाणा के सोनीपत जिले के जट्टी कलां गांव में जन्मे पंडित लखमी चंद के पिता साधारण किसान थे। वह भी बहुत नहीं पढ़ सके, लेकिन उनकी चेतना का विस्तार कबीर सरीखा था। उनके कहे में ग्रामीण परिवेश के शब्द और भाव थे। यही कारण था कि उनकी रागनियां और सांग आज भी जन-जन के कंठ में बसी हैं। हरियाणवी का शायद ही कोई ऐसा लोकगायक होगा, जिसने लखमनीचंद की रागनियां न गाई हों।

पौराणिक किस्सों से दिया समाज को ज्ञान

भारतीय ज्ञान परंपरा में वेद, पुराण और किस्सों की अहम भूमिका रही है। पंडित लखमीचंद ने इनके जरिए ही आम जन को जीवन के कठिन पहलुओं को सहज शब्दों और भावों के जरिए पहुंचाया। उनकी रचनाओं का प्रकाशन लखमीचंद का ब्रह्मज्ञान खंड 1 और खंड 2 के तौर पर प्रकाशित हुआ है। पंडित लखमीचंद की रागनी का एक लिंक भी यहां पेश है, जिस पर क्लिक करके आप पूरी रागनी सुन सकते हैं।

प्रेम, सत्य और त्याग की कहानियां सुनाती रागनियां

हरियाणा के कलाकार प्रेम से उन्हें दादा लखमीचंद कहते हैं। लखमीचंद ने त्याग के पर्याय कहे जाने वाले राजा हरीशचंद्र पर रागनियों को किस्से के तौर पर पिरोया है और उन पर रागनियों की रचना की और गाया। इसके अलावा उन्होंने भारत में वर्णित नल-दमयंती के किस्से को भी रागनी के जरिए जन-जन तक पहुंचाया। यही नहीं भारतीय पौराणिक साहित्य में अहम स्थान रखने वाले सत्यवान और सावित्री की प्रेम कहानी को भी उन्होंने अपने ढंग से प्रस्तुत किया। इसके अलावा हीर रांझा के किस्से को भी उन्होंने हरियाणवी में रागनी के तौर पर पेश किया।

लोकभाषा में संवाद करते थे लखमीचंद

पंडित लखमीचंद की रागनियां और सांग खासे संवादपरक हैं। आम लोगों तक इन्होंने जो छाप छोड़ी है, वह वास्तव में शोध का विषय है। किस प्रकार एक लोक कला जन-जन के कंठ में बस जाती है, इसका लखमीचंद की रचनाएं अप्रतिम उदाहरण हैं। उनकी संवादपरकता, हरियाणवी भाषा क्षेत्र में उनके प्रभाव और समाज में उनकी गहरी पहुंच निश्चित तौर पर शोध का विषय हैं। अब तक उन पर व्यवस्थित ढंग से शोध नहीं हुआ हैं। इसके अलावा उनकी यदि उनके संबंध में व्यवस्थित ढंग से कुछ लिखा जाए तो निश्चित तौर पर उनको लेकर लोगों को जानकारियां मिल सकेंगी। इसके अलावा रागनी और सांग जैसी लोककला की प्रतिष्ठा भी बढ़ सकेगी।

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