साहित्यिक पत्रकारिता के स्तंभ- शिवपूजन सहाय

हिंदी साहित्यकारों ने समय-समय पर हिंदी पत्रकारिता में अपना योगदान दिया है। साहित्यकारों के मार्गदर्शन में पत्रकारिता ने भी नई ऊंचाईयों को प्राप्त किया है। साहित्य और पत्रकारिता का जब सम्मिश्रण होता है, तब पत्रकारिता सूचना ही नहीं जनशिक्षण और सांस्कृतिक उत्थान का भी माध्यम बनकर उभरती है। हिंदी साहित्यकारों का हिंदीपत्रकारिता से पुराना नाता रहा है जैसे भारतेंदु हरीश चन्द्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी प्रेमचंद, माधवराव सप्रे एवं आचार्य शिवपूजन सहाय आदि।
आचार्य शिवपूजन सहाय की बात की जाए तोपत्रकारिता के क्षेत्र में वे साहित्यिक सरोकारों कोपत्रकारिता से जोड़ने के लिए जाने जाते हैं।पत्रकारिता की विधा से जब साहित्य जुड़ता है, तोपत्रकारिता भाषा के स्तर पर समृद्ध होती है और सामाजिक सरोकारों से भी सहज रूप से जुड़ जाती है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने इस कार्य को भली-भांति अंजाम दिया। 9 अगस्त, 1993 को बिहार के शाहाबाद जिले में जन्मे शिवपूजन सहाय ने पत्रकारिता को खासतौर से साहित्यिक पत्रकारिता को एक दिशा प्रदान की। शिवपूजन सहाय छात्रजीवन से ही पत्रकारिता से जुड़ गए थे, उनके लेख ‘शिक्षा‘, ‘मनोरंजन‘, और ‘पाटलिपुत्र‘ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे।
सहाय जी का समय वह समय था जब भारत अंग्रेजी दासता से मुक्ति के लिए संघर्षरत था। ऐसे समय में शिवपूजन सहाय जैसे व्यक्तित्व का स्वाधीनता आंदोलन के संग्राम से जुड़ना स्वाभाविक ही था। गांधी जी के असहयोग आंदोलन में सहभागिता के लिए वे सरकारी नौकरी को छोड़कर आरा के स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्य करने लगे। लेकिन सहाय जी का पत्रकार मन पत्रकारिता से जुड़ने के लिए व्याकुल था, अतः आरा से ही उन्होंने 1921 में ‘मारवाड़ी सुधार‘ मासिक पत्रिका का संपादन प्रारंभ किया। इसके पश्चात् वे 20 अगस्त, सन 1923 में कोलकाता से प्रकाशित होने वाले ‘मतवाला‘ से जुड़ गए। शिवपूजन जी ‘मतवाला‘ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। इस पत्र में कार्य करने के दौरान उनको महान साहित्यकार और पत्रकार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का भी सहयोग प्राप्त हुआ। ‘मतवाला‘ को मूर्त रूप देने में शिवपूजन सहाय की प्रमुख भूमिका रही थी। ‘मतवाला‘ छपकर बाजार में आया तो धूम मच गई।
‘मतवाला‘ ने जबरदस्त लोकप्रियता प्राप्त की। साहित्य, समाज, संस्कृति, राजनीति, शासन, धर्म आदि सभी विषयों पर मतवाला में लेख और समाचार प्रकाशित होते थे। यह पत्र वैचारिक रूप सेलोकमान्य तिलक से प्रभावित रहा। साथ ही ‘मतवाला‘ को गांधी के साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन में भी गहरी आस्था थी। ‘मतवाला‘ के संपादन के अलावा उन्होंने ‘मौजी‘, ‘आदर्श‘, ‘गोलमाल‘, ‘उपन्यास तरंग‘ और ‘समन्वय‘ जैसे पत्रों के संपादन में भी सहयोग किया। कुछ समय के लिए सन् 1925 में आचार्य सहाय ने ‘माधुरी‘ का भी संपादन किया। इसके पश्चात सन् 1926 में वे पुनः ‘मतवाला‘ से जुड़ गए।
शिवपूजन सहाय ने भागलपुर के सुलतानगंज से छपने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘गंगा‘ का भी संपादन किया। इसके अलावा उन्होंने पुस्तक भंडार पटना के साहित्यिक पत्र ‘हिमालय‘ का भी संपादन किया। सन् 1950 में बिहार सरकार द्वारा गठित बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का पहला निदेशक सहाय जी को ही चुना गया था। सन् 1950 में ही बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन की त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘साहित्य‘ के संपादन की जिम्मेदारी भी सहाय जी को ही मिली थी। सहाय जी ने विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आचार्य शिवपूजन सहाय हिंदी की उन्नति के लिए सदैव चिंतित रहे। उन्होंने कहा- ‘‘हम सब हिंदी भक्तों को मिलकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि साहित्य के अविकसित अंगों की भली-भांति पुष्टि हो और अहिंदी भाषियों की मनोवृत्ति हिंदी के अनुकूल हो जाए।‘‘ शिवपूजन सहाय की संपादन कला की एक बानगी यह भी है कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा का संपादन भी उन्होंने ही किया था। राजेन्द्र प्रसाद ने उनकी प्रशंसा इन शब्दों में की थी- ‘‘जेल से निकलने पर इतना समय नहीं मिला कि इसे दोहराऊं। यह शिवजी (शिवपूजन सहाय) की कृपा की फल था कि वह प्रकाश में आ सकी। अत्यन्त अपनेपन से उन्होंने हस्तलिखित प्रति ले ली और बहुत परिश्रम करके उसे पढ़ा ही नहीं बल्कि जहां-तहां लिखने में जो भूले रह गईं थीं उनको भी सुधारा। शिवजी की इस प्रेमपूर्ण सहायता की जितनी भी प्रशंसा करूं, थोड़ी है।‘‘
साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में सहाय जी ने जो भी कार्य किया, वह सराहनीय रहा। हिंदी भाषा और साहित्यिक पत्रकारिता में उनका योगदान मील का पत्थर साबित हुआ। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक के पद पर रहते हुए उन्होंने बिहार के ‘साहित्यिक इतिहास‘ को चार खण्डों में समेटा। साहित्य में उनके बेहतरीन योगदान के लिए उन्हें ‘पद्मभूषण‘ और ‘वयोवृद्ध साहित्यिक सम्मान‘ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रदान किए गए।
पत्रकारिता के अतिरिक्त सहाय जी ने अनेकों कृतियों की रचना की। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद ने उनकी समस्त रचनाओं को ‘शिवपूजन रचनावली‘ के नाम से चार खण्डों में प्रकाशित किया है। एक पत्रकार और साहित्यकार के रूप् में उन्होंने हिंदी भाषा की जीवन भर सेवा की। 21 जनवरी, सन् 1963 को संपादकप्रवर आचार्य शिवपूजन सहाय चिरनिद्रा में लीन हो गए। ऐसे समय में जब पत्रकारिता और साहित्य की दूरी बढ़ती प्रतीत हो रही है, हिंदी के दधीचि कहे जाने वाले सहाय जी की स्मृतियां साहित्यिक पत्रकारिता का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य करती हैं।

 

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