सूचना का माध्यम पश्चिमी गेटकीपर्स : विजय क्रान्ति

भारतीय पत्रकारिता में समय-समय पर व्यापक परिवर्तन आए हैं जिनमें कुछ सकारात्मक भीहैं तो कुछ नकारात्मक भी। इसके साथ ही डिजिटलाइजेशन के कारण आज मीडिया की सूरत ही बदल चुकी है। पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रान्ति से बातचीत के कुछ अंश-

- पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका आगमन कैसे हुआ?

मै किरोड़ीमल कॉलेज में विज्ञान का छात्र था। मेरी लिखने में काफी रूचि थी। कॉलेज की साहित्यिक पत्रिकाओं व अन्य पत्रिकाओं में मैं लिखा करता था। कॉलेज की पत्रिका ने पहले मेरी लिखने में रूचि बढ़ाई और फिर मुझे महसूस हुआ कि मैं पत्रकार भी बन सकता हूं। उस दौर में लिखने की शैली विकसित करने का जो मौका मिला वो बहुत मजेदार था और कॉलेज खत्म होते ही मैंने निर्णय लिया कि मुझे पत्रकार बनना चाहिए।

- पत्रकारिता के दौरान आपके कुछ रोचक अनुभव?

एक बार मेरी पिटाई हुई थी जो अभी तक याद है। एक बार एक स्टोरी के लिए मैं अजमेर गया था। उन्हीं दिनों वहां एक और स्टोरी मिल गई। वहां एक बहुत बड़े सैक्स रैकेट का खुलासा हुआ था, जिसमें एक राजनीतिक दल का नेता भी शामिल था। उसकी अदालत में पेशी के दिन हम यह स्टोरी कवर करने के लिए पहुंच गए। पेशी के लिए वह गाड़ी में आने ही वाला था कि यूथ कांग्रेस के नेताओं ने घोषणा कर दी कि कोई भी अखबार वाला उसकी फोटो नहीं खीचेगा और जो खीचेगा उसके हाथ पैर तोड़ देंगे। मैं आगे बढ़ा और कहा कि जो करना है कर लो, हम अपना काम करके रहेंगे। जो ही मैंने कैमरा उठाया तो किसी ने मेरी गर्दन पकड़ ली, किसी ने सिर पर मारा। अगले दिन अखबार में खबर छप गई कि दिल्ली के पत्रकार पिट गए और मेरा नाम भी छप गया। इस प्रकार मेरे घर के लोगों को पता चला तो वह परेशान हो गए, फिर बाद में मैंने सूचना दी कि मैं ठीक हूं। इस तरह की घटना पत्रकारिता में आम है। उस समय तो बड़ा बुरा लगता है लेकिन बाद में सुनने सुनाने में काफी मजा आता है। एक और बड़ी रोचक घटना थी। जब 1992 में भारत सरकार और चीन सरकार ने भारत-तिब्बत सीमा, बॉर्डर ट्रेड के लिए दोबारा खोली तो हमारी टीम को वहां स्टोरी के लिए जाना था। मेरे सहयोगी पत्रकारों ने वहां जाने से मना कर दिया क्योंकि उन्हें पता चला कि एक दिन के लिए पैदल चलना पड़ेगा। चूंकि तिब्बत में मेरी रूचि थी तो मैंने जाने का निर्णय लिया और पता चला कि एक दिन नहीं बल्कि छह दिन पैदल चलना पड़ेगा। मैं धरसुड़ा से लेकर ठाणीदार, बाॅर्डर कुंजी होते हुए लिपुलेन तक पैदल गया। इस बीच जिस खच्चर पर मैंने अपना बैग रखा था वो खो गया। तो 5 दिन तक बिना कपड़े बदले मैं पैदल चला। हालत ये थी कि कपड़ों में बदबू आने लगी थी, फिर भी रोज पैदल चलना था। खाने को कुछ मिल नहीं रहा था। सोने के लिए जगह मिली जहां खच्चर सोते हैं। बीच में केवल ढाई फीट की दीवार थी जिसके एक तरफ खच्चर सो रहा था और एक तरफ मैं। बीच-बीच में जब उसकी दुम लगती थी तो नींद खुल जाती थी। 5-6 दिन बाद वो खच्चर मिला जिस पर मेरा बैग था और फिर मैंने कपड़े बदले।

- वर्तमान पत्रकारिता के दौर में आप क्या बदलाव देखते हैं?

पत्रकारिता में मैं 1970-71 में आया था। तब से लेकर अब तक पत्रकारिता में बहुत बदलाव आए हैं जिनमें कुछ अच्छे हैं तो कुछ दुर्भाग्यपूर्ण भी हैं। सकारात्मक बदलाव की बात करें तो आज पत्रकारिता के प्रशिक्षण केन्द्रों में बढ़ोतरी हुई है जिसके कारण विद्यार्थियों को अच्छा प्रशिक्षण मिल रहा है। जबकि हमारे समय में पत्रकारिता के बहुत ज्यादा प्रशिक्षण केन्द्र नहीं थे। इसके साथ ही मुद्रण तकनीक में भी डिजिटिलाइजेशन के कारण अखबारों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। पहले हिन्दी अखबारों के एक या दो संस्करण आते थे और आज एक ही अखबार के 18-19 संस्करण आते हैं जिसके कारण पत्रकारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। समाचार पत्रों के प्रसारण में भी वृद्धि हुई है। दूसरी ओर नकारात्मक बदलाव यह है कि मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए पश्चिमी हितों की जो घुसपैंठ है उनके लिए संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं। मीडिया में यह बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ है। मीडिया में आज जो कुछ भी आ रहा है उसमें से कई सामग्रियां ऐसी होती हैं जिनको आम जन के समक्ष प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। आज यह मीडिया के लिए चुनौती बन गया है।

- प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में से कौन पत्रकारीय मूल्यों को बेहतर तरीके से निभा पा रहा है?

मेरा मानना है कि अन्तर प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर है। अच्छे और समझदार पत्रकार, चाहे वह प्रिंट में हो या इलेक्ट्रॉनिक में अपना काम बखूबी निभा रहे हैं, लेकिन कुछ पत्रकार मीडिया का दुरूपयोग भी कर रहे हैं। अभी हाल ही में राडिया केस हुआ तो टेप हर जगह पहुंची। पता चला कि अखबारों के संपादक मीडिया की एजेंट से डिक्टेशन लेकर लिख रहे हैं। उस समय एक अखबार का संपादक राडिया से डिक्टेशन लेकर अपना लेख लिख रहा था जो बड़ी शर्मनाक बात है, लेकिन तकनीक में विस्तार होने के कारण ही ऐसे लोगों पर से पर्दा उठने लगा है, जो अच्छा है। इस प्रकार मीडिया में यह परिवर्तन थोड़ा शर्मनाक है, किन्तु रोचक है।

- फोटो पत्रकारिता में आप क्या बदलाव देखते हैं?

फोटो पत्रकारिता आज बहुत गतिशील हो गई है, खासतौर से डिजिटिलाइजेशन के बाद। पहले किसी खबर से संबंधित फोटो छपने में काफी समय लग जाता था। अगर खबर सुदूर क्षेत्र की है तो फोटो फिल्म को कार्यालय भेजने और उसका प्रिंट प्राप्त करने में 2-3 दिन का समय लग जाता था, लेकिन आज फोटो डिजिटल होने के कारण ईमेल से तुरन्त भेज दी जाती है। इसने एक ओर तो फोटो पत्रकार की चुनौतियों को बढ़़ा दिया है, तो वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र में संभावनाओं की भी बढ़ोतरी हुई है।

- आपकी सबसे यादगार फोटो प्रदर्शनी कौन सी है?

मुंबई स्थिति यूनिवर्सिटी फॉर वुमन में तिब्बतन वुमन एसोसिएशन ने एक फेस्टिवल आयोजित किया था जिसमें मैंने भी एक फोटो प्रदर्शनी लगाई थी। उसमें मैंने निर्वासन में रह रही तिब्बती महिलाओं को प्रदर्शित किया था। प्रदर्शनी के चैथे दिन चीनी दूतावास से एक जनरल आए और एक फोटो को देखकर भड़कते हुए उन्होंने उसे हटाने को कहा। उन्होंने कॉलेज की वाइस चांसलर पर दबाव बनाकर वो फोटो हटवा दी। उस फोटो का कसूर यह था कि उसमें संयुक्त राष्ट्र के सामने दो तिब्बती महिलाएं बैठी हुई आंख बंद कर एवं हाथ जोड़कर शांतिपूर्ण ढंग से आजादी की मांग कर रही थीं। उनमें से एक के हाथ में प्लैकर्ड था जिस पर लिखा था चाइना क्विट तिब्बत। वह जनरल उस फोटो को देख भड़क कर बोल रहे थे वाई शुड चाइना क्विट तिब्बत, तिब्बत इज ए पार्ट आॅफ चाइना, हू इज दिस बास्टर्ड फोटोग्राफर। इससे यह हुआ कि चार दिन यह प्रदर्शनी चली और यह फोटो दुनियाभर में प्रख्यात हो गई। इस फोटो से मैं काफी प्रभावित था क्योंकि इसमें अपने देश पर कब्जा होने के बाद भी दो महिलाएं आंखें बंद करके शांतिपूर्ण ढंग से प्रार्थना कर रही थीं। इसीलिए मैं यह फोटो अपनी प्रदर्शनी में पहली या आखिरी फोटो के तौर पर प्रदर्शित करता हूं।

-तिब्बती मामले को लेकर मुख्य धारा की मीडिया का क्या रूख है?

मुख्य धारा का मीडिया वैसे तो सहानुभूति रखता है, लेकिन यह भी सच है कि तिब्बत को पूरी दुनिया की मीडिया में जितना स्थान मिला है उतना भारतीय मीडिया में नहीं मिला। भारत और तिब्बत के हित कितने समान है, इसको लेकर भारतीय मीडिया उदासीन है। जितने भरोसे से जागरूक मीडिया को बोलना चाहिए वह भारतीय मीडिया नहीं बोल पा रहा है। मेरे विचार से भारतीय मीडिया को तिब्बती मामले को अपने प्राथमिक मामलों में शामिल करना चाहिए क्योंकि कई काम जो सरकार नहीं कर सकती, वो मीडिया और जनता कर सकती है।

-वर्तमान समय में भारतीय मीडिया में अन्तर्राष्ट्रीय कवरेज से क्या आप संतुष्ट हैं?

भारत में अंतर्राष्ट्रीय खबरें आज भी दुर्भाग्य से सूचना के पश्चिमी गेटकीपर्स कही जाने वाली चार बड़ी एजेन्सियों से ही प्राप्त हो रही हैं। इसके कारण जो भी मुद्दें पश्चिम के हित में हैं, वो दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए उन्हें इराक व ईरान के मुद्दें बड़े लगते हैं जबकि हमारे लिए यह मुद्दें बड़े नहीं है, लेकिन भारतीय मीडिया फिर भी इसे दिखाता रहता है क्योंकि दुनियाभर की खबरें यही एजेन्सियां नियंत्रित करती हैं। इस प्रकार भारतीय मीडिया उनके लिए एक उपकरण बनकर रह जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय अखबारों व एजेन्सियों को भी अपने ब्यूरो दुनियाभर में फैलाने चाहिए जिससे भारतीय नजरिए से अंतर्राष्ट्रीय खबरें देश में आए।

-आज आम आदमी की नजरों से मीडिया का जो महत्व घटा है उसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

पिछले कुछ समय में मीडिया में काफी शर्मनाक मामलें सामने आए हैं। मीडिया का आज जो महत्व घटा है उसके पीछे मीडिया की ही गलती है। आज कई महत्वपूर्ण मुद्दें व बड़ी खबरें मीडिया में गौण होकर रह जाती हैं जबकि सनसनी के कारण बचकानी खबरें सामने आती हैं। आज मीडिया की प्राथमिकताएं खिसक गई हैं और यह तब तक खिसकती रहेगी जब तक मीडिया सनसनी पैदा करने वाली खबरें बनाता रहेगा। ऐसी हालत में मीडिया अपना बचाव नहीं कर पाएगा। इसीलिए मीडिया को अपनी प्राथमिकताओं में सुधार करना चाहिए तभी उसे सम्मान भी मिलेगा।

-वर्तमान समय में मीडियाकर्मियों को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?

मीडिया पर आज कई तरह का दबाव है जो बाहरी भी है और भीतरी भी। बाहरी दबाव यह है कि आज जितने भी राजनीतिक दल, कार्पोरेट्स या मीडिया में हित रखने वाले अन्य दल हैं, वह मीडिया का अपने ढंग से प्रयोग करना चाहते हैं और उनके पास इसके लिए संसाधन भी है जिसके कारण वह दबाव बना सकते हैं। इसके अलावा आंतरिक दबाव मीडिया मालिकों का है। मीडिया का विस्तार इतना ज्यादा हुआ है कि आज मीडिया का स्वामित्व गंभीर लोगों के हाथों में नहीं है। एक समय था जब टाइम्स आॅफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स समेत बाकी सब अखबारों का स्वामित्व इज्जतदार व गंभीर लोगों के हाथों में था लेकिन आज प्रोपर्टी डीलर्स व माफियाओं ने अपने चैनल खोल रखे हैं। इस प्रकार जिन मूल्यों के कारण वह अमीर बने हैं उन्हें वह चैनल में भी लेकर आते हैं। एक और ध्यान देने वाली बात है कि जिस तरह से व्यवस्था बदल रही है उसके अनुसार मीडिया का ट्रेड यूनियन बहुत कमजोर हुआ है। ट्रेड यूनियन केवल वेतन बढ़ाने या घटाने के लिए ही नहीं बल्कि मीडिया पर एक नैतिक दबाव भी बनाए रखता था। इस प्रकार मीडियाकर्मियों को नैतिक मूल्य बनाए रखने, आंतरिक व बाहरी दबावों को झेलने के लिए ट्रेड यूनियन का जो समर्थन था, वह खत्म हो गया है। एक परिवर्तन प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण भी हुआ है। आज टीआरपी के फेर में सेंसेशनलिज्म हावी हो रहा है जिसके कारण इस तरह की सोच रखने वाले पत्रकार मालिकों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं। यह सब आज पत्रकारिता में दुर्भाग्यपूर्ण है।

-मीडिया में आने वाले नवागंतुकों को आप क्या संदेश देना चाहते हैं?

मीडिया में जो नए लोग आ रहे हैं उनके लिए सलाह है कि वह ग्लैमर को देखकर मीडिया में न आए। मीडिया की जो जिम्मेदारियां हैं, खतरें हैं, तनाव हंै, उन सबको झेलने की क्षमता उनके अंदर हो और इन सबकों झेलते हुए भी वह जिम्मेदारी से अपना काम निभा सकें। यह एक चुनौती है। मीडिया में अच्छा काम करने वालों के लिए संभावनाएं बहुत है लेकिन आपमें सम्मान, समझदारी व जिम्मेदारी के साथ खड़े रहने की कितनी ताकत है, यह तय करेगी कि आप कितने सफल होंगे।

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