साइऑप्स (साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज)

साइऑप्स यानी साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज विभिन्न कालखंडों में युद्ध कला का एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय प्रारूप रहा है। अभी हाल ही में भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में जिस तरह का टकराव देखने को मिला, वहां दोनों देशों ने अपने-अपने स्तर पर इस हथियार का इस्तेमाल करने का प्रयास किया। साइऑप्स ऐसी लड़ाई है जो मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा लड़ी जाती है। इसका उद्देश्य दुश्मन के अंदर सुनियोजित ढंग से मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया को उद्घटित करना होता है, ताकि हथियारों की लड़ाई के पहले ही दुश्मन का मनोबल तोड़ दिया जाए। इतिहास के पन्ने पलटने पर आप पाएंगे कि प्राचीन काल से ही लोग मनोवैज्ञानिक युद्ध करते आ रहे हैं। कुछ ऐतिहासिक लड़ाइयों के जरिए इस अवधारणा को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
फारसियों और मिस्र के लोगों के बीच 525 ईसा पूर्व में लड़ी गई पेलुसियम की लड़ाई मनोवैज्ञनिक रूप से लड़ी गई थी। मिस्र के लोग बिल्लियों की पूजा करते थे। यह बात फारसी जानते थे। वह बिल्ली को सेना के आगे करते ताकि मिस्र वाले उन पर वार ना कर दें। वह लड़ाई अंततः फारिसयों ने हथियारों से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध द्वारा जीती थी। मंगोल के सेनापति चंगेज खान का नियम था कि पहले गांव को जलाकर राख करके दूसरे गांवों का मनोबल तोड़ा जाए, ताकि उनमें लड़ने की क्षमता ही न बचे। अगर एक गांव के सब लोगों को मार दिया तो आगे वाले गांव के लोग बिना लड़े ही हथियार डाल देते थे। भारत में मुगलों के राज का भी कमोबेश यह एक बड़ा कारण रहा है। भारत के भी कई राजा-महाराजा मुगलों से मनोवैज्ञानिक युद्ध की वजह से ही हारे। भारत पर करीब 200 वर्षों तक शासन करने वाले अंगे्रजों ने भी इसी नीति का अनुसरण किया था। आधुनिक युग में लड़े जा रहे युद्ध भी इसी नीति को आधार बनाकर लड़े जा रहे हैं। अमेरिका में अक्सर हर लड़ाई के पहले प्रोपे्रगेंडा फैलाया जाता है। विश्व के इतिहास में हर जीतने वाले ने मनोविज्ञान के आधार पर अधिकतर अपने दुश्मन का मनोबल तोड़ा है। यही है मनोवैज्ञानिक लड़ाई। यदि गहराई से देखा जाए, तो सारे युद्ध मनोवैज्ञानिक ही होते हैं, क्योंकि दिखने वाली हार जीत युद्ध की योजना और उसके सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। युद्ध विद्या के जानकार मानते हैं कि युद्ध के निर्णय पहले ही तय हो जाते हैं। सामान्य व्यक्ति को वह युद्ध के परिणाम बाद में दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ही एक युद्ध विचारक सून जू ने अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ वार’ में लिखा है -समस्त युद्धों में विजय का मूल भ्रम है। युद्ध की विभिन्न रणनीतियों में शत्रु के दिमाग को पढ़कर उसके विपरीत योजना बनाना और उसे लागू करना यही युद्ध का मनोवैज्ञानिक पहलू है।
कोई ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब कश्मीर में जारी अशांति के मद्देनजर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा था कि साइबर जगत में लड़ा जाने वाला ’मनोवैज्ञानिक युद्ध’ हमारे समय का नया खतरा बन चुका है। उन्होंने नए युग के इस युद्ध में मुकाबला करने के लिए लोगों से ’सोशल मीडिया सैनिक’ बनने का अनुरोध किया था। इसके साथ ही उन्होंने इस हकीकत को भी जोर देकर बयां किया था कि मौजूदा समय में दुनिया हैरतअंगेज गति के साथ बदल रही है। पहले पारंपरिक युद्ध होते थे, फिर परमाणु युद्ध हुए और फिर लिमिटेड इन्टेंसिटी वार (जैसे करगिल युद्ध) हुआ। लेकिन आज का खतरा साइबर युद्ध है और वह भी इस मनोवैज्ञानिक युद्ध के जरिए।
मनोवैज्ञानिक युद्ध की मारकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने संकेत किया कि विश्व के जीवित जंग के मैदानों के रूप में प्रसिद्ध राजौरी तथा पुंछ के जिलों में गोलियां इतनी प्रभावशाली नहीं होतीं, जितना कि मानसिक स्तर पर लड़े जाना वाला युद्ध। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर जवान मानसिक स्तर पर अपने आप पर तथा दुश्मन पर विजय हासिल कर लेता है, तो वह आप तो सुरक्षित रहता ही है, अपने साथियों को भी इस आग से बचाए रखता है। इसी मानसिक युद्ध, जिसे मनोवैज्ञानिक युद्ध भी कहा जा सकता है, के कारण ही आज भारतीय सैनिक पाकिस्तानी सेना पर विजय हासिल किए हुए हैं इस सच्चाई के बावजूद कि पाक सेना ने इन दोनों सेक्टरों में अधिकतर ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर रखा है। गोलियों की बरसात और पाक सैनिकों द्वारा समय-समय पर परिस्थितियों को भयानक बनाने की कोशिशों के बावजूद भारतीय सैनिक अपना मनोबल नहीं खोते हैं। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि वे मनोवैज्ञानिक युद्ध में सफलता के झंडे गाढ़ चुके होते हैं। यही कारण है कि नियंत्रण रेखा पर कई स्थानों पर पाकिस्तानी तथा भारतीय सीमा चैकियों में अंतर 100 फुट से भी कम है, लेकिन क्या मजाल पाक सैनिक की कि अपने सामने वाले पर गोलियां दाग सकें।
इतिहास के झरोखे में झांककर देखें तो भारतीय सभ्यता बार-बार बाहरी विचारधाराओं का प्रभाव में आई और लगभग हर विचारधारा ने इसके मनोविज्ञान को प्रभावित करने को प्रयास किया। बंटवारे से पहले हिन्दुओं को बाहरी देशों से आये इस्लाम और इसाई धर्मों से अपने देश को बचाने के लिये संघर्ष करना पड़ता था, किन्तु बंटवारे के पश्चात् विदेशी धर्मों के अतिरिक्त विदेशी आर्थिक शक्तियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो हिन्दू जीवनशैली की विरोधी हैं।
दूसरी तरफ विश्व भर से भारत के खिलाफ सक्रिय राजनीतिक मिशन पड़ोसी देशों में युद्ध की स्थितियां और कारण उत्पन्न करते रहे हैं, ताकि विकसित देशों के लिये उन देशों को युद्ध का सामान और हथियार बेचने हेतु बाजार उपलब्ध रहे। एक देश के हथियार खरीदने के पश्चात् उसका विरोधी भी हथियार खरीदेगा और यह क्रम चलता ही रहेगा।
दूसरे देशों पर नियंत्रण रखने की भावना से कार्य कर रही ये ताकतें लक्षित देश की तकनीक को विकसित नहीं होने देतीं और उसमें किसी ना किसी तरह से रोड़े अटकाती रहती हैं। देशभक्त नेताओं की गुप्त रूप से हत्या या उनके विरुद्ध सत्ता पलट भी करवाते हैं। इस प्रकार के सभी यत्न गोपनीय क्रूरता से करे जाते हैं। उनमें भावनाओं अथवा नैतिकताओं के लिये कोई स्थान नहीं होता। इसी को ‘कूटनीति’ कहते हैं। कूटनीति में लक्षित देशों की युवा पीढी को देश के नैतिक मूल्यों, रहन सहन, संस्कृति, आस्थाओं के खिलाफ भटकाकर अपने देश की संस्कृति का प्रचार करना तथा युवाओं को उसकी ओर आकर्षित करना भी शामिल है, जिसे मनोवैज्ञानिक युद्ध कहा जाता है। यह बहुत सक्षम तथा प्रभावशाली साधन है। इसका प्रयोग भारत के खिलाफ आज धड़ल्ले से हो रहा है। इस नीति से समाज के विभिन्न वर्गों में विवाद तथा विषमतायें बढ़ने लगती हैं तथा देश टूटने के कगार पर पहुंच जाता है।
आमने-सामने की जंग के अलावा भी कई अन्य क्षेत्रों में मनोवैज्ञानिक युद्ध छिड़ा हुआ है। इसके जरिए विकसित देश अपने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के साथ-साथ बाजार के विस्तार में जुटे हुए हैं। इसके लिए इन्होंने आज ऐसी कई कपटी विधियां ईजाद कर ली हैं, जो अल्पविकसित या भारत जैसे विकासशील देशों की जनता, खासकर युवा वर्ग के मनोविज्ञान को मनमाफिक सांचे में ढाल रही हैं। इस पूरे खेल में ब्रांड एम्बेसेडरों तथा रोल माॅडलों की सहायता से पहले अविकसित देश के उपभोक्ताओं की दिनचर्या, जीवन-पद्धति, रुचि, सोच-विचार, सामाजिक व्यवहार की परम्पराओं तथा धार्मिक आस्थाओं में परिवर्तन किये जाते हैं, ताकि वह घरेलू उत्पादों को नकार कर नये उत्पादों के उपयोग में अपनी ‘शान’ समझने लगें। युवा वर्गों को अर्थिक डिस्काउंटस, उपहार, नशीली आदतों, तथा आसान तरीके से धन कमाने के प्रलोभनांे आदि से लुभाया जाता है, ताकि वह अपने वरिष्ठ साथियों में नये उत्पादों के प्रति जिज्ञासा और प्रचार करें। इस प्रकार खानपान तथा दिखावटी वस्तुओं के प्रति रुचि जागृत हो जाती है। स्थानीय लोग अपने आप ही स्वदेशी वस्तु का त्याग करके उसके स्थान पर बाहरी देश के उत्पादों को स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार घरेलू बाजार विदेशियों का हो जाता है। कोकाकोला, फेयर एण्ड लवली, लोरियाल आदि ब्रांड्ज की भारत में आजकल भरमार इसी अर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध के कारण है।
ऐसा ही एक युद्ध भारत की सनातन परंपराओं का दुष्प्रचार करने हेतु छेड़ा गया है। भारतीय संतों के खिलाफ दुष्प्रचार के लिये स्टिंग ऑपरेशन, साधु-संतों के नाम पर यौन शोषण के उल्लेख, नशीले पदार्थों का प्रसार और फिर ‘भगवा आतंकवाद’ का दोषारोपण किया जाता है। अकसर इन प्रसार माध्यमों का प्रयोग हमारे चुनावों के समय में हिन्दू विरोधी सरकार बनवाने के लिये किया जाता है। भारत के अधिकतर मुख्य प्रसार माध्यम ईसाइयों, धनी अरब शेखों या अन्य हिन्दू विरोधी गुटों के हाथ में हैं, जिनका इस्तेमाल हिन्दू विरोध के लिये किया जाता है। भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता के बहाने कुछ नहीं करती। अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देना, मानवाधिकारों की आड़ में उग्रवादियों को समर्थन देना तथा हिन्दू आस्थाओं के विरुद्ध दुष्प्रचार करना आजकल मीडिया का मुख्य लक्ष्य बन चुका है। नकारात्मक समाचारों को छापकर वे सरकार और न्याय-व्यवस्था के प्रति जनता में अविश्वास और निराशा की भावना को भी उकसा रहे हैं। हिन्दू धर्म की विचारधारा को वह अपने स्वार्थों की पूर्ति में बाधा समझते हैं। कॉन्वेन्ट शिक्षित युवा पत्रकार उपनिवेशवादियों के लिये अग्रिम दस्तों का काम कर रहे हैं। सनातन परंपराओं के खिलाफ लड़ा जा रहा यह युद्ध भी प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मनोवैज्ञानिक आधार पर ही लड़ा जा रहा है।
इस प्रकार अलग-अलग कालखंडों में रूप बदलकर साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज, युद्ध क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। मनोविज्ञान को आधार बनाकर लड़े जाने वाले इस प्रकार के युद्ध में सूचनाएं प्रमुख भूमिका में रहती हैं। भारत के विरोध में उतरी इन फौजों द्वारा छेड़े गए युद्ध अंततः उन्हें परास्त करने हेतु जरूरी है कि हर भारतीय न केवल इन षड्यंत्रों को समझे, बल्कि उन्हें परास्त करने के लिए एक प्रभावी तैयारी करे।

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