खतरे की घंटी है टिकटॉक की फैंटेसी

चाइनीज टिकटॉक ऐप खुद के अभिव्यक्ति का एक साधन होने का दावा करती रही है। हालांकि पिछले कई दिनों से यह अलग-अलग कारणों से विवादों में है। इसी क्रम में बहुत से बुद्धिजीवियों ने टिकटॉक को पूर्णता बंद करने की मांग की है। टिकटॉक को लेकर अब तक के अनुभव से देखें तो यह मांग बहुत हद तक उचित जान पड़ती है। टिकटॉक ने युवाओं को न केवल अनुत्पादक कार्यों में लगाया है, बल्कि युवा मस्तिष्क को हिंसात्मक विचारों से भरने का कार्य भी किया है। तकनीकी कंपनियों के धड़ल्लेदार मार्केटिंग तिकड़मों से अनजान युवा वर्ग को यह पता भी नहीं चल पाता कि कब वे पॉर्नोग्राफी जैसी अनैतिक दुर्गुणों का शिकार हो जाते हैं। टिकटॉक के विरोध में लिखने का यह अर्थ कभी भी नहीं कि हम मनोरंजन के ही खिलाफ हैं। टिकटॉक जैसे मंच मनोरंजन के नाम पर जिस अनैतिकता को बढ़ावा दे रहे हैंए उसे मनोरंजन कैसे मान लिया जाए। इसी बीच समाज के कुछ जागरूक नागरिकों ने टिकटॉक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, तो यह काफी हद तक सही प्रतीत होता है।

टिकटॉक पर विवादास्पद वीडियो पोस्ट करने पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उन्होंने ट्वीट करके आरोप लगाया कि मैं मजबूती के साथ टिकटॉक इंडिया को पूर्णतया प्रतिबंधित करने के पक्ष में हूं और इसके लिए वह भारत सरकार को भी लिखेंगी। यह न केवल आपत्तिजनक वीडियोज को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि युवाओं को गैर-उत्पादक जीवन की ओर धकेल रहा है। यहां ये कुछ फोलाअर्ज के लिए जी रहे हैं और जब यही नंबर कम हो जाते हैं, तो मौत को भी गले लगा लेते हैं। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब टिकटॉक को प्रतिबंधित करने की मांग उठी हो। नवंबर 2019 में हीना दरवेश ने मुंबई हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी जिसमें कहा गया था कि यह ऐप अपराधों और मौतों का कारण बन रहा है। इसी बीच टिकटॉक पर पिछले साल मद्रास उच्च न्यायालय ले प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे बाद में हटा लिया गया। 12 मार्च को अमेरिका में रिपब्लिकन सीनेटर जॉश हावले ने सीनेट में एक बिल पेश किया कि सभी फेडरल सरकारी उपकरणों पर चीनी सोशल मीडिया ऐप टिकटॉक को डाउनलोड व इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगाया जाए, क्योंकि यह अमेरिकी सरकार की डाटा सुरक्षा पर एक जोखिम हो सकता है। इस तरह से यह भारत और दुनिया के दूसरे कई देशों में बार-बार सवालों के घेरे में आता रहा है।

कुछ समय पहले महाभारत के भीष्म पितामह मुकेश खन्ना ने भी टिकटॉक को बेकार बताया था। उन्होंने इस पर अश्लीलता फैलाने का भी आरोप लगाया था। मुकेश खन्ना ने यह भी कहा कि इस ऐप के उपयोग कर युवा नियंत्रण से बाहर हो रहा है। इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने कहा था।

टिक टॉक टिक टॉक घड़ी में सुनना सुहावना लगता है। लेकिन आज की युवा पीढ़ी का घर मोहल्ले, सड़क-चैराहे पर चंद पलों का फेम पाने के लिए सुर-बेसुर में टिकटॉक करना बेहूदगी का पिटारा लगता है। कोरोना चायनीज वाइरस है। यह सब जान चुके हैं। पर टिकटॉक भी उसी बिरादरी का है, यह भी जानना जरूरी है। टिकटॉक फालतू लोगों का काम है। और यह उन्हें और भी फालतू बनाता चला जा रहा है। अश्लीलता, बेहूदगी, फूहड़ता घुसती चली जा रही है आज के युवाओं में इन बेकाबू बने वीडियोज के माध्यम से। इसका बंद होना जरूरी है। खुशी है मुझे कि इसे बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। मैं इस मुहिम के साथ हूं।

टिकटॉक एक बार तब भी सुर्खियों में था जब फैजल सिद्दीकी का टिकटॉक अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया था। इसके बाद उनके भाई आमिर सिद्दीकी का टिकटॉक अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया गया था। आमिर सिद्दीकी के टिकटॉक अकाउंट सस्पेंड होने के पीछे कास्टिंग डायरेक्टर नूर सिद्दीकी की याचिका भी बताई जा रहा है। अब उनका टिकटॉक अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया है, जिसके 38 मिलियन यानी 38 लाख फॉलोअर्स हैं। आमिर ने यू-ट्यूब कम्युनिटी के खिलाफ एक वीडियो बनाया था, जिसके बाद से वो ज्यादा खबरों में थे। बता दें कि पहले टिकटॉक वर्सेस यू-ट्यूब का मामला आया। इसके बाद फैजल सिद्दीकी का वीडियो वायरल हुआ, जिस पर एसिड अटैक को बढ़ावा देने का आरोप लगा। इस आरोप के बाद सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे वीडियो घूमने लगे जिन पर यौन हिंसा और जानवरों पर अत्याचार के आरोप लग रहे हैं।

इतनी आसानी से टिकटॉक के जाल में फंसने के पीछे एक बेहद सामान्य सा मनोविज्ञान कार्य कर रहा होता है। लंबे समय से बॉलीवुड ने युवाओं के मन में एक अजीबोगरीब  फैंटेसी पैदा कर रखी है कि उनका लाइफ स्टाइल आम आदमी की तुलना में खास होता है। इसलिए बॉलीवुड की इस फैंटेसी से प्रभावित बहुत से भारतीय खासकर युवा खुद को सेलिब्रिटी के तौर पर देखना चाहते हैं। टिकटॉक इनैक्टमेंट के दौरान टिकटॉकर खुद को अभिनेता या अभिनेत्री के रूप में देखने लगता है। हालांकि यह भी सच है कि हर कोई बच्चा अभिनेता और अभिनेत्री नहीं बनने वाले। फिर क्यों उन्हें समय और ऊर्जा की बर्बादी से नहीं रोका जा रहा

इन सब विवादों के बीच टिकटॉक ने एक पोस्ट किया है जिसमें उन्होंने कुछ स्पष्टीकरण दिया है, लेकिन इतने भर से बात बनने वाली नहीं। भारतीय समाज को अब समझना होगा कि अपने बहुमूल्य जीवन का अधिकतर समय टिकटॉक पर विडियोज बनाकर दूसरों का मनोरंजन करने के लिए आप लोग क्यों खुद को साधन बना रहे हैं? कायदे से तो माता-पिता को अपने बच्चों को ऐसे अनुत्पादक कामों में न उलझने से समझाना चाहिए, लेकिन बहुत से मां-बाप स्वयं बच्चों के साथ मिलकर वीडियोज बना रहे हैं। ऐसे मां-बाप अपने बच्चों से क्या उम्मीद रख सकते हैं?

अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाना चाहते हैं, तो उन्हें इन सब फूहड़ कार्यों से हटाकर रचनात्मक एवं उत्पादक कार्यों में लगाना होगा। इसमें बहुत से कार्य हो सकते हैं, जैसे समाजसेवा, स्वाध्याय, देशभक्ति और नैतिक मूल्यों से अवगत करवाना। हमारे मार्गदर्शक शास्त्र भी इसी बात पर बल देते हुए व्याख्या करते हैं। सद्भिरेव सहासीत सद्भिरकुर्वीत सङ्गतिम्।

 

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