शिकारी आंखों से कुंभ की कवरेज

जहां भीड़ इकट्ठा होती है, वहां मीडिया का जमावड़ा लगना स्वाभाविक है, मीडिया के इस जमावड़े का असर भीड़ और मीडिया दोनों के ऊपर देखने को मिलता है। मीडिया कवरेज निष्पक्ष हो, भीड़ के मन को पढ़े व उद्देश्य को समझे। मीडिया देश, काल और पात्र को केन्द्र में रखकर रिर्पोटिंग करे, तो सकारात्मक प्रभाव डालता है। मगर संकट की स्थिति तब पैदा होती है जब मीडिया देश, काल और पात्र को केन्द्र में न रखकर, अपना एजेंड़ा पहले से तैयार रखता है और  अपने तय एजेंडे के मुताबिक रिर्पोटिंग करता है।

कुछ ऐसी ही स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा कुम्भ मेले पर देखने को मिलती है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया की कुम्भ पर कवरेज उस शिकारी की तरह होती है, जो अपने शिकार पर घात लगाये बैठा होता है कि कब शिकार गलती करे, और शिकारी उसे धर दबोचे। इसका  उदाहरण अल जजीरा का वो आर्टिकल है, जिसमें कुम्भ मेले को एक आपदा के रूप में बताया गया। 2003 में नासिक कुम्भ मेले में भगदड़ मचने से कुछ लोगों की मृत्यु हुई व कुछ लोग घायल भी हुए, इसे आधार बनाकर अल जजीरा ने पूरे कुम्भ के परिणाम को ही विपत्तिपूर्ण बताया। बीबीसी ने तो इस दुर्घटना को 1999 में केरल के एक हिंदू धार्मिक स्थल पर मची भगदड़ से जोड़ दिया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब कुम्भ में मची भगदड़ को इस तरह से दिखाया गया हो, और न ही इसमें मात्र अल जजीरा व बीबीसी शामिल हैं बल्कि कई अन्य अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया भी शामिल हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा कुम्भ पर आपत्तिजनक कवरेज का एक उदाहरण जनवरी 2001 इलाहाबाद (प्रयागराज) कुम्भ का वह प्रकरण है, जिसमें ‘चैनल 4’ नामक एक ब्रिटिश पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टर पर कुम्भ मेला उत्सव के आयुक्त सदा कांत ने आरोप लगाया व दावा किया कि ‘चैनल 4 की टीम ने 25 वर्षीय एक मैक्सिकन महिला को आपत्तिजनक रूप में फिल्माया था और नागा साधुओं व अन्य व्यक्तियों के स्नान के समय अजीबोगरीब फोटोग्राफ लिये गये थे, जो कि भारतीय भावनाओं को आहत करने वाले थे’। इस प्रकरण पर तत्कालीन कुम्भ मेला निदेशक अरविंद नारायण मिश्रा के अनुसार ‘ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों व भारत में रहने वाले लोगों ने ‘चैनल 4’ व ‘बीबीसी’ द्वारा आपत्तिजनक कवरेज के बारे में शिकायत की है’। जिस कारण कुम्भ मेले के समय गंगा में नहाने की जगहों पर फोटो लेने व वीडियो बनाने पर बैन लगा दिया गया। मामले की गम्भीरता और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया की इस अनैतिकता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले को भारत के उच्चायुक्त के साथ ब्रिटेन में उठाने तक की नौबत आ गई थी।

अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया भारत और कुम्भ के प्रति कितना संवेदनशील है, इसका अन्दाजा ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ के एक आर्टिकल से लगाया जा सकता है, जिसमें बाकायदा लिखा है कि ‘धार्मिक सम्मेलनों में भारत त्रासदी के लिए कोई अजनबी नहीं है’ यानि भारत धार्मिक सम्मेलनों में दुर्घटनाओं के लिए जाना जाता है। वाल स्ट्रीट आगे लिखता है कि ‘भारत में ऐसी त्रासदियां अक्सर आती रहती हैं, जहां धार्मिक सम्मेलन होते हैं, और भीड़ को नियंत्रण करने व सुरक्षा व्यवस्था का अभाव होता है’। इस आर्टिकल में कुम्भ 2013 रेल हादसे के साथ, भारतीय मन्दिरों व भारतीय धार्मिक स्थलों, जहां पर दुर्घटनायें हुई है, को सिलसिलेवार तरीके से बताया गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया कुम्भ को पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं। उनके लिए यह पर्व केवल मनोरंजन के लिए है। नागा साधु इनके केन्द्र में होते हैं, नागा साधुओं की राख से लिपटी नग्न फोटो लेना और फिर उस फोटो व नागा साधुओं का अपने हित के लिए विश्लेषण करना। इनका एजेंडा भी पहले से तय है कुम्भ में आये श्रद्धालुओं की गन्दी व अजीबोगरीब तस्वीरें लेना, जिसमें किसी के लम्बे बाल, दाढ़ी, जो उलझें हों, शरीर पर कपड़े ना हो, राख से लिपटा शरीर हो, जिनका माथा टीके और चन्दन से भरा हो, जिससे वे इसे आदिवासी के रूप में दिखा सकें। अपने एजेंडे के मुताबिक अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया का एकमात्र उद्देश्य भी तो यही है कि साधुओं की  अजीबोगरीब तस्वीरें लेना, उनके रहन-सहन, खान-पान को ऐसे दिखाना जैसे वो किसी दूसरी दुनिया के लोग हों। लंगर में बैठे साधु जिनकी अपनी अलग वेश-भूषा होती है, साधुओं की चिलम पीते हुए तस्वीरें लेना ताकि उन्हे नशेड़ी साबित कर सके, साधुओं के हाथ में तलवार, त्रिशूल व डण्ड़ों की फोटो, वीडियो, और डाक्यूमेंट्री बनाना, जो मात्र आकर्षण का केन्द्र बनें। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया कवरेज का उद्देश्य व केन्द्र भारतीय संस्कृति, मां गंगा व कुम्भ की मान्यताओं, कुम्भ का महत्व, कुम्भ में होने वाली चर्चाओं व उसके परिणामों पर कत्तई नहीं है।

कुम्भ का आयोजन व इसका महत्व मात्र स्नान तक नही है, यह संवाद व चर्चा के लिहाज से, भारतीय संस्कृति, हिन्दू धर्म की मान्यताओं को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है। बिना कोई निमंत्रण दिए, बिना किसी प्रलोभन के कुम्भ में इतने बड़े जनसैलाब का उमड़ना, कड़ाके की ठण्ड़ में भी गंगा में डुबकी लगाना, साधु-संतो के जप-तप, त्याग को समझना, कुम्भ के प्रति भक्तों की भावनाओं को समझ पाना, यह सब अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए दूर की कौड़ी है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि उनके यहां ऐसा अद्भुत संगम न तो कभी देखने को मिला है और न ही कभी मिलेगा। यह संगम मात्र नदियों का नहीं है, यह तो विचारों का है, मान्यताओं का है, आस्थाओं का है। सामान्य व्यक्ति से लेकर साधु-संतो और विभिन्न जाति, लिंग, आय, आयु का संगम है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया कुम्भ को भारतीय नजरिये से, धार्मिक आस्था और नैसर्गिक शान्ति के प्रयास को देखे व समझे इसकी अपेक्षा करना स्वयं को झूठा दिलासा देना व धोखे में रखने जैसा है।

कुम्भ मेला भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है, वैश्विक स्तर पर कुम्भ ने अपना परचम लहराया है, कुम्भ के महत्व का अंदाजा अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया को इस बात से लगाना चाहिए कि  यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण संबंधी अंतर सरकारी समिति ने दक्षिण कोरिया के जेजू में 4 से 9 दिसंबर 2017 को अपनी 12वीं सत्र बैठक में कुम्भ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है। इस सूची में बोत्सवाना, कोलंबिया, वेनेजुएला, मंगोलिया, मोरक्को, तुर्की, और संयुक्त अरब अमीरात व अन्य देशों के विभिन्न सांस्कृतिक पर्व शामिल हैं।

15 जनवरी मकर संक्रान्ति के दिन प्रथम शाही स्नान के साथ प्रयागराज में अर्द्ध कुम्भ शुरू हो रहा है। कुम्भ मेले की कवरेज के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया प्रतिनिधियों की खास व्यवस्था के लिए मीडिया कैम्प बनाया गया है। किसी भी देश की छवि बनाने व बिगाड़ने में मीडिया आज मुख्य हथियार के रूप में काम कर रहा है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया भारत व कुम्भ को किस रूप में दिखा रहा है, इस पर निगरानी रखना व गौर करना आवश्यक है।

 

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