होना मेरे मैं सा

जैसे ही किसी जनसामान्य को पता चलता है आप एक कलाकार हैं, आप किसी को चित्रित कर सकते हैं तो वह व्यक्ति विस्मय और कुतूहल से भरकर पूछ बैठता है- मेरा चित्र बना लोगे? कलाकार तनिक मुस्कान के साथ कहता है- हां, बन जाएगा। इस पर वह आंखों में आश्चर्य भरकर विश्वास जमाते हुए कहता है- मेरा फोटो? मेरा मतलब एकदम ऐसा ही मेरा चेहरा बना देंगे। कलाकार के हां में सिर हिलाते ही वह विनीत भाव में आश्चर्य से जड़ हो जाता है। उसकी आंखें सोचने लगती हैं उसका अपना ही रूप कैसा होगा? जिसे वह आईने में देखा करता है। किसी प्रतिबिंब जैसा होगा या उसके अपने जैसा होगा?  उसकी अपनी मनोछवि जिसे केवल अंतर की आंखें ही देख सकती हैं। क्या ऐसा रूप कलाकार बनाता है? वास्तव में कलाकार चंचल मन छवियों का चितेरा होता है। चित्रकर्म के विषय में भारतीय शिल्पग्रंथों में ‘दर्पणे प्रतिबिंबवत्’ अर्थात दर्पण में प्रतिबिंब की तरह चित्रित करने को सादृश्य कहा गया है। छवि गढ़ते समय जिस आकार को ध्यान रखकर अथवा सामने देकर चित्रकार जो बनाता है, धीरे-धीरे उस वस्तु-रूप की आत्मा में वह प्रवेश कर जाता है क्योंकि रचनाकारों में परकाया प्रवेश की शक्ति होती है। वह सामने वाले की आंखों में तिरकर हृदयस्थ भावों को छूकर वापस अपने मनोभावों में ढ़ालकर रूप गढ़ता है। 

 

स्वयं को छोड़कर जगत के सभी पदार्थ ‘अन्य’ हैं। अन्य में ‘स्व’ के सहारे भावों का आरोपण करके स्वरचना होती है। स्व के बोध की प्रतीति अन्य के रूपों में होती है। अतः कलाकार की यात्रा अन्य के रूप साधना के माध्यम से स्व का ही विस्तार है। किंतु जगत में अन्य सभी पदार्थों तत्वों के अपने गुण-धर्म विशेष्टताएं होती हैं। चित्रण में चित्रित वस्तु के गुण-भाव-रंग उसी के प्राकृतिक अवस्था में हो यह कलाकार के लिए पहली चुनौती होती है। हू-ब-हू या उस जैसा ही स्पंदित रूप गढ़ पाना भारतीय कला षडंग में ‘सादृश्य’ कहलाता है। यहां सादृश्य विधान ही जन सामान्य में आश्चर्य के भाव पैदा करता है। सादृश्य या सदृश अर्थात वैसा ही दिखना जैसा आपने देखा अथवा जैसा आपने सोचा। सादृश्य सबसे कठिन स्वाध्याय है, कलायात्रा का। किसी एक ही रूप, आकार, रंग की साधना चित्रण जीवन पर्यंत की असीमित सामग्री होती है। प्रकृति में विद्यमान अनगिनत रूप, बदलता स्वरूप कला साधना के कई छोर हैं जिसमें कोई रंग को लेकर चलता है, कोई देहयष्टि की भंगिमाएं ही चित्रित करता रह जाता है तो किसी का पूरा जीवन पुष्प बनाते-बनाते चुक जाता है, तो कहीं कोई बेडौल से अनगढ़ पत्थरों की अनबूझ मूकता पर ही  मूर्ति शिल्पों की श्रृंखला बनाकर अपना अलग मार्ग बना ले जाता है। क्योंकि यह संसार रूप-भाव ही है, जहां आकार ज्ञान हमारे चक्षु सीमा हैं। किसी के जैसा होते हुए या किसी के जैसा बनाते हुए सादृश्य गढ़ते-गढ़ते ये आंखें रूप पर ही तिरती रहती हैं।

 

किसी वस्तु के चित्रण में दो मुख्य बातों का ध्यान रखना पड़ता है- आकार और सतह की बुनावट। आकार एक आवरण रेखा है। किसी वस्तु की सत्य प्रतीति सतह की बुनावट से होती है। प्रकृति में उपस्थित सभी चीजों को आंखें उसकी विशिष्ट संरचनाओं से पहचानती हैं। कोई वस्तु खुरदुरी है, कोई चिकनी। इस चिकने-खुरदुरेपन की भी कई कोटियां हैं। जैसे संगमरमर की सतह, ग्रेनाइट पत्थर की सतह और चुनार बलुआ पत्थर की सतह की बुनावट। सभी पत्थर घिसने पर चिकने होंगे लेकिन सतह की संरचनाओं की भिन्नता से उसकी ओप (चमक) भिन्न-भिन्न होगी। इस तरह असंख्य रूप असंख्य संरचनाएं। कला में आकारिकी की संरचना का महत्वपूर्ण उपकरण है सादृश्यता।

 

सादृश्यता व्यापक अवधारणा वाला शब्द है। यह केवल सतह की बुनावट की कारीगरी मात्र नहीं है। यह कारीगरी तो केवल रूप-साम्य का आश्चर्य भर है। भारतीय कला अवधारणा में इसका प्रयोग गुण-भाव के अनुसार किया गया है। इसीलिए हमारे यहां आराध्य के चेहरे, शरीर में सौम्यता, लालित्य जैसे गुण-भाव को प्रतिस्थापित किया गया है। सौम्यता एक  गुण-भाव है। इसको दर्शाने के लिए कोई एक मानवी चेहरा आदर्श नहीं बनाया गया बल्कि एक ऐसा रूप हो जो सौम्यता के समस्त भाव लक्षणों का समन्वित रूप हो। हमारे यहां सृजित आराध्य का सादृश्य किसी एक के जैसा नहीं होता बल्कि कुछ-कुछ सबके जैसा होता है। उदाहरण स्वरूप भगवान विष्णु के सौम्यता, नटराज की भंगिमाए या बुद्ध का मुखमंडल। यह किसी सामान्य की सामूहिक अपेक्षाओं का भाव है। वहीं आप पाश्चात्य पौराणिक देवताओं की प्रतिमा- अपोलो, ऐथेना आदि को देखिए। इन प्रतिमाओं के मुखमंडल किसी सामान्य जन की मुखाकृति का हु-ब-हू चित्रण लगता है।

 

भारतीय पक्ष भाव की सादृश्यता महत्वपूर्ण मानता है और वहीं पाश्चात्य सौन्दर्य दृष्टि में आकार और सतह की यथार्थ बुनावट होती है। अर्थात आंखों से जैसा दिखता है, उतनी ही मात्रा में रंग, प्रकाश और समय दिखाया जाता है जबकि भारतीय कला में आंतरिक पक्ष का विशेष प्रकटीकरण है। सत्व, रज, तम के विशेष गुण-भाव और उनको व्यक्त करती विशिष्ट मुद्राएं बिल्कुल भिन्न सौंदर्य दृष्टि की मांग करती हैं। यहां तात्पर्य यह नहीं है कि पाश्चात्य कला में भाव नहीं है बल्कि वहां सादृश्यता शुद्ध मानवी रूप में संयोजित है। जैसे फ्रेंच कलाकार रेम्ब्रां के व्यक्ति चित्र। उन चित्रों में चित्रित चेहरे मूल व्यक्तियों से कहीं अधिक सुंदर प्रतीत होते हैं। चित्र में चित्रित वस्तु व्यक्ति की सहज पहचान हो और उस वस्तु व्यक्ति के अंदर चल रही संवेदनाओं-भावों का भी उसी अनुपात में चित्रण होना चाहिए।

 

विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र अध्याय में सादृश्य को चित्र का महत्वपूर्ण अंग कहा गया है- ‘चित्रे सादृश्यकरणं  प्रधानं परिकीर्तितम्’

दृश्य कलाओं (चित्र-मूर्ति-स्थापत्य) में सादृश्य की प्रमाशक्ति का होना जरूरी है। सादृश्यता तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य पैदा करती है। इस परिप्रेक्ष्य को पढ़ने में कलाकार की मेधा जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण है माध्यम के साथ बर्ताव। अलग-अलग माध्यमों यथा- काष्ठ, मिट्टी, पत्थर, कांस्य, फाइबर और भित्ति चित्र,कैनवास पेपर इत्यादि में रूपांकन करते समय इनका प्रयोग और प्रकृति दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है। वस्तुतः सादृश्य एक स्वाध्याय है, निरंतर साधना है दृष्टिकोण का। चूंकि कलाएं चाक्षुष होती हैं। अतः देखने की तुलनात्मक दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न भाव प्रकट करता है। भाव अदृश्य होता है किंतु अपनी भंगिमाओं से उसका पता चलता है। सही मायने में वही कला लोगों के मानस में उतर पाती है जिसमें मनोभावों का सशक्त चित्रण हो। जैसे महान कलाकार नंदलाल बोस द्वारा बनाई गई गांधी जी पर एक रेखांकन है जिसमें केवल पीछे की ओर से लाठी लिए गांधीजी का एक रेखांकन में उनका व्यक्तित्व उतर आया है। बहुत कम रेखाओं में गांधीत्व को साध लेना यही कलाकार की सादृश्य साधना है।

 

किसी रूपाकार का एकाग्र मन इतना अभ्यास कर लेता है कि उस वस्तु आकार के सरल रेखांकन का मुहावरा बना लेता है। वह शैली बन जाती है, उसकी पहचान बन जाती है। इसी तरह जामिनी राय ने कालीघाट के पटचित्रों की शैली को अपनी कला में ढालकर भारतीय कला जगत को लोक शैली का नया मुहावरा प्रदान किया।

 

प्रकृति में चेतन तत्व की अनुभूति कलाकार को अधिक संवेदनशील बनाता है। संवेदनशीलता किसी प्रतिकृति के निर्माण में जीवंतता का सृजन करता है। आकार का अभ्यास उसका अनुपात स्वाध्यायपूर्वक सीखा जा सकता है, परंतु बाह्याकार को चित्रित करना ही अभीष्ठ नहीं होता। उसमें प्राणछन्द होना चाहिए। केवल बाह्याकार की चित्रण क्षमता ही नहीं बल्कि भावों की आंतरिक सादृश्य की भी अनुभूति होनी चाहिए। जिसकी संवेदना जितनी गहरी होती है, मानव से इतर प्रकृति के हर वस्तु में उसकी यात्रा उतनी ही गहरी होती है, इसलिए वह पाता है, अजंता, वाघ(गुफा चित्र) के चित्र, इसलिए वह बना पाता है पत्थरों में बुद्ध की करुणामयी आभा। इसलिए वह खींंच पाता है लयात्मक रेखाओं में नंदलाल बोस की ‘वीणा-वादिनी’। तभी तो विश्व में पिकासो की ‘गुएर्निका’ और भारत के महान मंदिरों का भव्य शिल्प आकार ले पाता है।

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