बडे़ बदलाव की दस्तक

कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न हालात में भारतीय मीडिया ऐसे बडे़ बदलाव के मुहाने पर पहुंच गया है जहां मीडिया मालिकों, मीडियाकर्मियों और पाठकों/श्रोताओं सहित ‘न्यूजमेकर्स’ को भी अपनी आदतें बदलनी पड़ रही हैं। परन्तु यह तो बदलाव की दस्तक भर है। आने वाले दिनों में मीडिया का स्वरूप और भी नये रंगों में नजर आएगा। इसलिए और भी बडे़ बदलाव की तैयारी अभी से प्रारंभ कर लीजिए।

भारतीय मीडियाकर्मियों के लिए कोरोना वायरस के कारण लागू घरवास (लॉकडाउन) एक भयावह सपना सिद्ध हुआ है। उनकी हालत बेघर हुए लाखों प्रवासी मजदूरों से भी बदतर है। यह सही है कि ऑनलाइन मीडिया में काम करने वाले पत्रकार लॉकडाउन से उतने प्रभावित नहीं हुए, परन्तु प्रिंट और टेलीविजन पत्रकारों के सामने नौकरी का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। जो पत्रकार स्वतंत्र लेखन करके अपना जीवन-यापन करते रहे हैं अथवा छोटे समाचार पत्र-पत्रिकाओं में काम करते थे उनकी स्थिति बहुत दयनीय हो चली है। हालत यह है कि पत्रकारों के प्रमुख संगठन, दिल्ली पत्रकार संघ, के पास राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मियों ने लॉकडाउन के दौरान राशन आदि के रूप में मदद की गुहार लगायी और दिल्ली पत्रकार संघ ने महज अप्रैल माह में ही कई सौ पत्रकारों की विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से सहायता करायी। संकट में फंसे हर व्यक्ति की आवाज बुलंद करने वाले पत्रकारों की यह हालत होगी, यह किसी ने नहीं सोचा था। सरकार ने मजदूरों, किसानों आदि के लिए राहत पैकेज घोषित किये हैं, परन्तु कोरोना योद्धा के रूप में अग्रिम मोर्चे पर डटकर काम करते हुए इस खतरनाक वायरस की चपेट में आ चुके पत्रकारों की सुध किसी ने नहीं ली। बहुत से स्वाभिमानी पत्रकार आज भी किसी के सामने मदद हेतु हाथ फैलाने के लिए तैयार नहीं हैं, परन्तु प्रश्न यह है कि आखिर कब तक वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि संकट के अभी समाप्त होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

 

देशभर में पत्रकार भी हैं संक्रमितः

महामारी के दौरान अग्रिम मोर्चे पर रहकर काम कर रहे हैं अनेक पत्रकार देशभर में इस खतरनाक वायरस की चपेट में आ चुके हैं। मुंबई के ‘टीवी9मराठी चैनल’ के आईटी विभाग में कार्यरत रोशन डायस की तो 22 मई को इस वायरस के कारण मृत्यु हो गयी। रोशन पहले ‘स्टार न्यूज’ में भी काम कर चुके हैं। रोशन का अप्रैल में कोरोना टेस्ट हुआ था। उस टेस्ट में करीब 53 मीडियाकर्मी कोरोना पॉजिटिव मिले थे। उसी में रोशन भी एक था। उसे आइसोलेशन वार्ड में क्वारंटाइन किया गया था। हालत बिगड़ने पर उसे आईसीयू में भर्ती किया गया, जहां उसने 22 मई को दम तोड़ दिया। 46 वर्षीय रोशन के परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। इधर, राजधानी दिल्ली में ज़ी न्यूज के पत्रकारों के कोरोना की चपेट में आने की खबर है। इसके अलावा भी कुछ और मीडिया हाउसों ने कोरोना पॉजिटिव मामलों की सूचना दी हैै। इंडिया न्यूज नेटवर्क में आउटपुट टीम की एक महिला कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव पायी गयी है।

 

छोटे प्रकाशन बंदः

इस संकट का एक और पहलू है। लॉकडाउन के कारण हजारों की संख्या में छोटे समाचार पत्रों का देशभर में प्रकाशन बंद हो गया है। यहां तक कि नामचीन पत्र-पत्रिकाएं सिर्फ डिजिटल संस्करण प्रकाशित करने के लिए बाध्य है। ‘पांचजन्य’ और ‘आर्गनाइजर’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाएं भी सम्पूर्ण लॉकडाउन की अवधि में सिर्फ डिजिटल संस्करण ही अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर रही हैं। हालांकि यह बात अलग है कि लॉकडाउन की इस अवधि में इसके डिजिटल पाठकों की संख्या में कई गुणा वृद्धि हुई है। यदि ये पत्रिकाएं इन डिजिटल पाठकों को अपने नियमित ग्राहकों में तब्दील कर लें तो यह उनकी बड़ी कामयाबी मानी जाएगी। यही सवाल अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी है।

 

‘वर्क फ्रॉम होम’ स्थायी ‘ट्रेन्ड’

लॉकडाउन के दौरान मीडिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ को बिना झिझक स्वीकार्यता मिली है। यहां तक कि देश की ‘पीटीआई’ जैसी बड़ी न्यूज एजेंसी का पूरा स्टाफ घर से ही काम कर रहा है। हालांकि, वर्ष 2015 से मेरे जैसे कुछ लोग मीडिया में ‘वर्क फ्रॉम होम’ की बात उठाते रहे हैं। परन्तु बड़ी संख्या में मीडिया नियंता हमारे सुझाव पर हंसते थे। परन्तु अब ‘वर्क फ्रॉम हॉम’ ने ही न केवल मीडिया संस्थानों का अस्तित्व बचाया, बल्कि मीडियाकर्मियों की नौकरी भी बचायी। संकट की इस घड़ी में जब लोग समाचार पत्र और पत्रिकाओं को भी वायरस फैलने का एक माध्यम मानकर उन्हें खरीदने में संकोच कर रहे हैं ऐसे में डिजिटल तकनीक ने लोगों की नवीन समाचारों की भूख को शांत किया है। हालांकि महामारी के कारण ‘वर्क फ्रॉम होम’ की यह परम्परा लॉकडाउन के बाद कितने दिन जारी रहेगी यह कहना अभी मुश्किल है, परन्तु बेहतर होगा कि मीडिया संस्थान इसे अपनी आदत में शामिल कर इसे नये ‘वर्क कल्चर’ के रूप में स्वीकार करें। सोशल मीडिया कंपनी ‘फेसबुक’ के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने 25 मई, 2020 को घोषणा की कि वर्ष 2030 तक उसके करीब आधे कर्मचारी अपने घरों से काम करने लगेंगे। कंपनी ने यहां तक कहा है कि वह सभी कर्मचारियों को स्थायी रूप से घर से ही काम करने की अनुमती देने की तैयारी कर रही है। फेसबुक अपने कर्मचारियों को यह विकल्प चुनने का ऑफर देने की तैयारी में है कि वे स्वयं तय करें कि वे कहां से बेहतर काम कर सकते हैं। इस दिशा में उनका तकनीकी विभाग इसे अमलीजामा पहनाने के लिए काम कर रहा है। ‘गूगल’ ने अपने कर्मचारियों को इस पूरे साल घर से काम करने की छूट दे दी है। ‘अमेजॉन’ और ‘माइक्रोसॉफ्ट’ ने भी इस साल कम से कम अक्टूबर तक घर से काम करने की अनुमति दे दी है। इसके अलावा सभी बड़ी कंपनियां सिर्फ तकनीक की मदद से घर से काम करके ही अपना व्यवसाय बचाकर अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन देने का प्रयास कर रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि महामारी के बाद घर से काम करना एक स्थायी ‘ट्रेंड’ बनने जा रहा है।

 

 

मीडिया में डिजिटल बूमः

कोरोना महामारी के दौरान जहां प्रिंट के प्रसार में जबर्दस्त कमी देखने को मिली है, वहीं टेलीविजन और डिजिटल की ‘व्युअरशिप’ में अप्रत्याशित उछाल आया है। टेलीविजन की बात करें तो आम मनोरंजन के कार्यक्रमों की तुलना में समाचारों की ‘व्युअरशिप’ भी काफी बढ़ी है। मनोरंजन की दृष्टि से दशकों बाद ‘दूरदर्शन’ की ‘व्युअरशिप’ में उछाल आया है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ सहित पुराने धारावाहिकों को एक बार फिर बहुत पसंद किया गया। डिजिटल मीडिया में समाचार वेबसाइट्स को 35 से 50 प्रतिशत तक अधिक रीडरशिप मिली है। इसमें भी मोबाइल पर खबरें पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में डिजिटल में अपार संभावनाएं हैं। अभी तक जो लोग आदतन छपा हुआ अखबार पढ़ने के आदी थे वे भी अब मोबाइल पर खबरें पढ़ने की आदत डाल रहे हैं। इसलिए जो मीडिया हाउस डिजिटल-केन्द्रित रणनीति बनाएगा वह आगे जाएगा। अभी डिजिटल के साथ सबसे बड़ा प्रश्न रेवेन्यू का है। इसलिए मीडिया के समक्ष बड़ी चुनौती यह है कि डिजिटल से ‘रेवेन्यू जनरेशन’ कैसे हो? इसके लिए सिर्फ मीडिया घरानों को ही नहीं, बल्कि पाठकों को भी बदलना पडे़गा। जितना पैसा वे हर माह अखबार के हॉकर को देते हैं उतना नहीं तो उससे कम पैसा देकर उन्हें डिजिटल संस्करण पढ़ने के लिए देने की आदत डालनी होगी। कुछ समाचार पत्रों ने डिजिटल में ‘सबस्क्रिप्शन मॉडल’ शुरू किये हैं। पहले जिन बड़े अखबारों ने इस मॉडल को नहीं अपनाया था अब वे भी ‘पेवॉल’ के बारे में सोचने को मजबूर हैं।

संकट के इस दौर में डिजिटल को इसलिए भी नया पाठक वर्ग मिला है क्योंकि हर कोई पल-पल की नवीन जानकारी चाहता है। सभी को चिंता है कि कब क्या हो जाए पता नहीं। कहीं उनकी ही बिल्डिंग में या आसपास कोरोना का कोई नया मामला तो नहीं निकल आया। जो नए रेड जोन जारी हो रहे हैं वे कौन-कौन से हैं? नई गाइडलाइंस जारी हो रही हैं। कोई नई अधिसूचना आ रही है, वॉट्सएप पर इससे जुड़ी तमाम खबरें आ रही हैं। इन सभी चीजों ने डिजिटल को और मजबूत किया है। लोगों को यह समझ में आ गया है कि उन्हें यदि किसी खबर के बारे में अपडेट चाहिए तो उन्हें डिजिटल से जुड़ना पड़ेगा और यदि खबर का सार चाहिए या किसी खबर का महत्वपूर्ण हिस्सा पढ़ना है या किसी खबर के बारे में 400-500 या हजार शब्दों में जानकारी चाहिए तो अगले दिन अखबार में ही मिलेगी। इसलिए समाचार पत्र का डिजिटल संस्करण भी चाहिए।

डिजिटल तीनों माध्यमों का समागम है, जहां पाठकों को टेक्स्ट, ऑडियो और विडियो सभी मिल जाते हैं। यह सुविधा अखबारों में नहीं मिलती।

 

चौंकाने वाले गैजेट्स की दस्तकः

गूगल-प्रेस एसोशिएसन के संयुक्त प्रयास से 2017 में प्रारंभ ‘रडार प्रोजेक्ट’ ने अमेरिकी और ब्रिटिश मीडिया में दो साल से खलबली मचा रखी है। सरकारी डाटा पर आधारित खबरें तैयार करने में यह प्रोजेक्ट काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसके अलावा चीन में टेलीविजन समाचार वाचन के लिए रोबोट एंकर के प्रयोग तीन साल से जारी हैं। हाल ही में चीन ने विश्व की पहली 3डी न्यूज एंकर को लांच किया। यह आधुनिक तकनीक से युक्त एक रोबोट है। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी ‘शिन्हुआ’ और एक अन्य एजेंसी ने मिलकर इसे बनाया है। यह 3डी न्यूज एंकर आसानी से घूम सकती है और जैसी खबर होती है उसके चेहरे के हावभाव भी वैसे ही बदल जाते हैं। ये अपने सिर के बालों और ड्रेस में भी परिवर्तन कर सकती है। अभी यह एक महिला की आवाज में ही न्यूज पढ़ती है मगर इसमें एक खास बात ये है कि यह किसी भी व्यक्ति की आवाज की नकल कर सकती है। यानि यदि आप अमिताभ बच्चन की आवाज में समाचार वाचन चाहते हैं तो आने वाले समय में वह भी संभव हो सकेगा। इसलिए संभव है कि आने वाले समय में ऐसे 3डी न्यूज एंकर ही चैनलों पर समाचार वाचन करते हुए नजर आएं। इससे पहले चीन ने 2018 में ‘क्यू हाउ’ नाम से डिजिटल एंकर का प्रयोग किया था। उसे मशीन लर्निंग तकनीक के जरिए आवाज की नकल करने के योग्य बनाया गया था। ‘शिन्हुआ’ का दावा है कि आने वाले कुछ दिनों में रोबोट एंकर स्टूडियो के बाहर भी समाचार पढ़ते हुए देखे जा सकेंगे। यानि अभी कुछ चैनलों के एंकर स्टूडियो के बाहर एंकरिंग करते हुए दिखते हैं मगर आने वाले समय में इसमें रोबोट का भी इस्तेमाल हो सकेगा। हो सकता है कि टीवी की दुनिया में ऐसे रोबोट एंकर ही प्राइम टाइम में खबरें पढ़ते हुए दिखाई दें।

 

भविष्य के अखबारः

कोरोना महामारी के कारण जो माहौल बनता नजर आ रहा है उसमें यदि आने वाले दिनों में बहुमंजिले मीडिया हाउस महज एक कक्ष में सिमट जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हो सकता है कि मीडिया हाउस अपने वर्तमान बहुमंजिले भवनों को किराये पर उठाकर उनसे पैसे कमाएं क्योंकि ‘वर्क फ्रॉम होम’ के कारण जब स्टाफ ही ऑफिस नहीं आएगा तो उन्हें विशाल भवनों की जरूरत नहीं होगी। इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में प्रिंट भी किसी गैजेट में सिमट जाए। पाठकों को रूमाल जैसे गैजेट थमा दिये जाएंगे। जब मन चाहा जेब से निकालकर खबर पढ़ ली और फिर मोडकर जेब में रख लिया। एक बदलाव यह होगा कि प्रिंट अब चौबीस घंटे में एक बार नहीं, बल्कि हर पल उस गैजेट के माध्यम से नवीन खबरें अपडेट करता रहेगा। इसलिए समाचार पत्र-पत्रिकाओं के स्वरूप में बड़ा बदलाव आना लाजिमी है। नये गजेट्स में सिमटने वाली पत्रिकाएं अब टैक्स्ट, ऑडियो और वीडियो का सम्मिश्रण उसी प्रकार प्रस्तुत करें जैसा कुछ साल पहले ‘हैरी पॉटर’ फिल्म और दूसरे कुछ ‘साइंस फिक्शन्स’ में देखा गया। कुल मिलाकर अब मीडिया मालिकों को ही नहीं, बल्कि मीडिया में काम करने वाले मीडियाकर्मियों, पाठकों और देश के नीति-निर्माताओं सभी को नये ढंग से सोचना होगा। जो इस बदलाव के लिए तैयार होंगे वे टिकेंगे जो नहीं बदलेंगे वे इतिहास का अध्याय बन जाएंगे।

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