पाकिस्तानः धारावाहिक के भरोसे इतिहास


वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण वास्तविकता की प्रस्तुति होती है। इस कार्य को मीडिया सबसे अच्छे ढंग से करती है। सूचना के युग में सामान्य जन की सामूहिक समझ लगभग सभी विषयों पर मीडिया द्वारा दी गयी सूचना पर आधारित होती है। मीडिया की भूमिका तब और बड़ी हो जाती है, जब कोई देश आत्म-विस्मृति का शिकार हो जाए और पहचान के संकट से गुजर रहा हो।

पाकिस्तान इसी प्रकार के रोग से ग्रस्त है। किसी भी देश के लिए अपनी सभ्यता की जड़ों को खोजना स्वाभाविक है, विशेषकर वे देश जो सैकड़ों वर्षों तक परतंत्र रहे हों। वे औपनिवेशिक शासन से प्रताड़ित थे, लेकिन पाकिस्तान अपनी जड़ें अपनी सभ्यता में न खोजकर, उस जमीन और चिंतन में खोजना चाहता है, जो उसका हिस्सा ही नहीं रहे।    

जब करोना का प्रकोप बढ़ा तो भारत में रामायण और महाभारत धारावाहिक का पुनःप्रसारण दूरदर्शन पर प्रारम्भ हुआ। इसी समय पाकिस्तान में भी राष्ट्रीय टीवी पर डिरिलिसः इर्तुग्रुल नाम से एक धारावाहिक का प्रसारण शुरू हुआ। मूलतः यह आटोमान साम्राज्य के स्थापना के पहले के इतिहास का चित्रण करता है। यद्यपि इसमें जेहाद और मध्यकाल में इस्लाम के गौरव को दर्शाया गया है, लेकिन यह इस्लाम की स्थापना या विस्तार के लिए नहीं लड़ा जा रहा है। इसमें संघर्ष को इस रूप में प्रस्तुत किया गया है, मानो एक कबीले का सरदार अपना शासन तंत्र स्थापित करना चाहता है। पाकिस्तान इस धारावाहिक को इस्लाम के पराक्रम के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान ने रमजान महीने के पहले दिन से इसका प्रसारण उर्दू में शुरू किया। इस धारावाहिक को देखने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तान के लोगों से निवेदन किया था। खान ने कहा कि इससे पाकिस्तान के लोग इस्लाम के इतिहास, उसकी संस्कृति और नैतिकता को समझेंगे। अरब देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र ने इस पर रोक लगा रखी है। पाकिस्तान के प्रमुख समाचार पत्र ‘द डॉन’ के अनुसार सऊदी अरब 40 मिलियन डॉलर का एक “मलिक ए नूर” नामक धारावाहिक का निर्माण इसके समांतर कर रहा है। जिसका अर्थ है कि अरब तुर्की के साम्राज्यवाद को सहन नहीं कर सकता है।

पहचान का संकट

पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह ‘पहचान के संकट’ से गुजर रहा है । पाकिस्तान 1947 ई. से पहले भारत था और इसकी उत्पत्ति सम्प्रदाय के आधार पर भारत के विभाजन से हुई है। उसके सामने यह द्वंद है कि वह अपनी जड़ें सिंधुघाटी सभ्यता, तक्षशिला और शारदा पीठ में देखें या इस वास्तविकता को नकार दें।

पहले वह इस्लाम के नाम पर अरब देशों के निकट गया। काफी समय तक सऊदी अरब से घनिष्ठता रही है। वर्तमान भारत का संबंध अरब देशों से मित्रवत है । प्रधानमंत्री मोदी ने ’लिंक वेस्ट एशिया’ के राजनयिक माध्यम से खाड़ी देशों के संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित की । पिछले 6 वर्षों में प्रधानमंत्री ने यूएई की तीन बार, सऊदी अरब की दो बार तथा बहरीन, कतर और ओमान की एक बार यात्रा की । आतंकवाद के खिलाफ साझे युद्ध, सुरक्षा, ऊर्जा, विज्ञान, समुद्री सुरक्षा जैसी द्विपक्षीय व बहुपक्षीय समझौते किये गए। परिणाम यह हुआ कि 2016 में सऊदी अरब ने मोदी को अपना सबसे बड़ा नागरिक सम्मान भी दिया था। बहरीन का भी तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘किंग हमद आर्डर ऑफ रेनशा’ प्रधानमंत्री मोदी को दिया। जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 के हटाने के बाद पाकिस्तान को वहाँ पर कोई समर्थन नहीं मिला। इसलिए पाकिस्तान इस समय तुर्की के निकट जाना चाह रहा है। अनुच्छेद 370 के विषय पर तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया था। अब पाकिस्तान स्वयं को तुर्क और ऑटोमन साम्राज्य से जोड़ने की कोशिश में है।

पाकिस्तान भारत को हिन्दू देश मानता है । भारत के इतिहास से अलग करते हुए पाकिस्तान अपनेआप को केवल भारत के इस्लामिक शासन से जोड़ता है। अपनी पहचान की खोज में वह इस्लाम को अपनाता है। इसका एक उदाहरण पाकिस्तान की सुरक्षा नीति है। यद्यपि युद्ध का फैसला सैन्य क्षमता और कुशल रणनीति पर निर्भर करता है, फिर पाकिस्तान की सोच समझने के लिए यह आवश्यक है। पाकिस्तान के प्रक्षेपास्त्रों का नाम गजनी, गौरी, अब्दाली और बाबर है। वह मोहमद बिन कासिम को अपना नायक मानता है। ये वही लोग हैं जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया, भारत को लूटा और यहां के नागरिकों पर अत्याचार किया। उस समय पाकिस्तान भारत ही था । अरबों ने सिंध पर आक्रमण किया था, पाकिस्तान पर नहीं। सिंध भारत था। सारांश यह कि पाकिस्तान अपने सभ्यता के आधार को नकारने लगा। सिंधु घाटी की सभ्यता में उसकी जड़ें हैं, इस सत्य़ से वह नजरें चुराने की कोशिश में है।

पाकिस्तान में पंजाब प्रांत की जनसंख्या सबसे अधिक है। पंजाब के लोग ही सरकार में प्रभुत्व रखते हैं। सेना, राजनीति और उद्योग में भी पंजाब के लोग ही बहुमत में है । यह वर्ग नीति-निर्धारक है। अहमद शाह अब्ब्दाली ने सबसे अधिक हत्या, बलात्कार और लूट-पाट पंजाब में ही किया। सबसे अधिक क्षति अब्दाली ने पंजाब प्रांत को ही पहुंचाई। पंजाब में एक कहावत थी कि सब खाकर-पीकर समाप्त कर दो, नहीं तो जो बचेगा उसे अब्दाली ले जाएगा, लेकिन भारत-विरोध के अंधेपन के चलते अब्दाली पाकिस्तान का हीरो है ।

पाकिस्तान की मांग करने वाले और पाकिस्तान का शुरुआती नेतृत्व करने वाले लगभग सभी लोग उस भूभाग से थे जो विभाजन के बाद पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बना। वें स्वयं ही पाकिस्तान में शरणार्थी हो गए और मुहाजिर कहलाए। भारत के प्रति उपजा असुरक्षा का भाव उसकी सैन्य नीति का निर्धारक तत्व बन गयी। भारत केन्द्रित असुरक्षा की अवधारणा की प्रबलता से पाकिस्तान में सैन्य संस्था का प्रमुख स्थान बन गया। यही सोच और समझ पाकिस्तान के प्रति सुरक्षा नीति के लिए उत्तरदायी है। सेना ने राजनीतिक संस्थाओं का इस्लामीकरण कर दिया। इस्लामिक पहचान की स्थापना और इस्लाम का वैश्विक नेतृत्व पाकिस्तान विदेश नीति का आधार बना। राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से सेना सबसे शक्तिशाली संस्था बन गई। इस प्रकार से इस्लाम और सैन्य व्यवस्था पाकिस्तान की पहचान हो गयी। शीतयुद्ध के समय में अमेरिका से गठबंधन और बाद में चीन के साथ गठबंधन उसके संकट की पहचान करने की क्षमता का परिचायक है। वर्तमान समय में पाकिस्तान की सुरक्षा, स्थिरता और संपन्नता चीन के हाथों में चली गयी है।

अब जब जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के बाद पाकिस्तान को अरब देशों से आपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा, तो वह इस्लाम के तुर्की संस्करण से अपनी पहचान जोड़ रहा है। पाकिस्तान का मानना है कि तुर्कों ने भारत पर 600 वर्षों तक शासन किया है। यह विजेता का मनोविज्ञान है । तुर्क के साथ जुड़कर वह भारत को हीन दिखाना चाहता है। वास्तविकता यह है कि इर्तुग्रुल के जरिए उसने अपनी पहचान के संकट को विश्व पटल पर लाकर रख दिया है। सिंध में राजा दाहिर को स्थानीय नागरिकों द्वारा अपना पूर्वज मानने के लिए चलाया जा रहा अभियान हो, या बलूचिस्तान में बलूच पहचान के लिए किया जाने वाला संघर्ष, या फिर इर्तुग्रुल का प्रसारण, सभी यही बताते हैं कि अपनी पहचान को लेकर पाकिस्तान ने जो झूठ गढ़ा था, अब वह दरक रहा है। भारतीय मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान पाकिस्तान में बढ़ रहे पहचान के संकट पर क्या दृष्टिकोण अपनाएंगे, इस पर सभी की नजर रहेगी। 

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