सच्चाई को दिखाने का साहसी प्रयास ’द जज’

सजग एवं साहसी फिल्म निर्देशक जीतू आरवमुदन ने ’द जज’ फिल्म बनाकर लव जिहाद की समस्या को जीवंत रूप में सामने लाने की एक जोरदार कोशिश की है। इसी फिल्म में उन्होंने तथाकथित सेक्युलरिज्म और उसके पैरोकार बुद्धिजीवियों के चेहरे से नकाब हटाने का प्रयास किया है। ’द जज’  पश्चाताप और आत्मग्लानि की एक ऐसी कहानी है  जिसने वर्तमान काल में हिंदू एवं अन्य समुदायों की महिलाओं के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को बड़ी संजीदगी के साथ प्रस्तुत किया है।

लगभग एक घंटे की इस कहानी के सभी किरदार अपनी भूमिका के साथ न्याय करते दिखे। सबसे अहम किरदार है जज का। सारी कहानी संजीव जोशी नाम के इस जज के इर्द-गिर्द घूमती है। संभवतः इसी कारण फिल्म का नाम ’द जज’ रखा गया है। सेकुलरिज्म और बुद्धिजीवियों की बात करने वाले जज साहब शुरू में ही बड़ी गंभीरता के साथ बताते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता न केवल हमारे लिए, अपितु पूरे देश के लिए भी गलत संकेत है, क्योंकि यह हमारी देश की पंथनिरपेक्षता के खिलाफ है। उसी जज के सम्मुख एक हिंदू लड़की का मामला आता है, जिसका नाम अवंतिका चौधरी है। वह लड़की एक मुस्लिम लड़के एजाज शेख के प्यार के चंगुल में फंसकर अपने पिता की बात को नकारते हुए उस मुस्लिम लड़के के साथ शादी करने की जिद पकड़े रखती है।

तीसरा किरदार अवंतिका के पिता का है। इस मामले को लेकर वह जज साहब से व्यक्तिगत तौर पर मिलकर बहुत सारे समाचार पत्रों की कटिंग्ज दिखाते हैं कि किस तरह लव जिहाद की शिकार हुई लड़कियों की हत्या कर दी जाती है। वह पिता जज से प्रार्थना करता है कि आप आदर्श हैं, आप ही मेरी बेटी का मार्गदर्शन कीजिए। इस पर जज साहब पंथनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं कि जिन बातों को मैं ही नहीं मानता, उन बातों को मैं कैसे अवंतिका को समझा सकता हूं। तब अवंतिका के पिता कहते हैं कि अगर मेरी बेटी की जगह आपकी बेटी होती तो आप क्या करते? इस पर जज साहब कहते हैं कि मैं आपको कट्टरवादी मूर्ख समझता हूं, जिसे धर्म के आगे इंसानियत नहीं दिखती। जज साहब केस का फैसला सुनाते हुए शादी की सहमति देकर पूरे देश को पंथनिरपेक्षता का संदेश देते हैं। उसके बाद जो होना था, वही हुआ। निकाह के 10 दिन बाद आयशा का (निकाह के बाद अवंतिका चैधरी का बदला हुआ नाम) अर्द्धनग्न शव प्राप्त होता है। उसकी हत्या उसके पति एजाज शेख द्वारा की जाती है, जो कि पहले से दो बार शादीकर चुका था।

इस फिल्म ने एक सामाजिक हकीकत को सामने लाने का सार्थक प्रयास किया है, जिसके तहत मुस्लिम पुरुषों द्वारा गैर-मुस्लिम लड़कियों का धर्मांतरण करवाने के लिए प्रेम का नाटक किया जाता है। आज यह एक विश्वव्यापी मुद्दा बना हुआ है। कई अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है। लव जिहाद को अगर हम दूसरे शब्दों में ’बेटी बचाओ, बहू लाओ’ योजना भी कह सकते हैं। हम सबके मन में एक सामान्य सा प्रश्न उठता है कि लव जिहाद करने और करवाने वालों का उद्देश्य क्या है? इसके पीछे राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारण हैं। इन कारणों से स्वतः ही धीरे-धीरे जनसांख्यिकी में परिवर्तन होगा और यह परिवर्तन राजनीतिक प्रणाली में भयानक सिद्ध होगा। धीरे-धीरे पूरे देश का इस्लामीकरण करना ही इन जिहादियों का उद्देश्य है। न्यायपालिका के समक्ष यह मामला पहली बार 2009 में आया था। तब केरल उच्च न्यायालय ने एक लंबी जिरह के बाद निष्कर्ष निकाला कि लव जिहाद का मामला वास्तव में है और इसकी आड़ में जबरदस्ती धर्मांतरण करवाया गया है। ऐसी घटनाएं तब से लेकर आज तक निरंतर बढ़ती ही जा रही हैं। आए दिन हम समाचार पत्रों में पढ़ते रहते हैं कि धर्म परिवर्तन नहीं करने पर मॉडल के साथ की मारपीट। लव जिहाद के नाम पर बेरहमी से हत्या। धर्म नहीं बदला तो मुस्लिम पति ने घर से निकाला। ऐसी कितनी ही घटनाएं हम अपने आसपास में होते हुए देखते हैं, परंतु फिर भी हम सब देखकर खामोश रहते हैं, क्योंकि यह घटनाएं दूसरे के घर में होती हैं। जब तक अपने घर में कोई घटना न घटे, तब तक हम सतर्क नहीं होते। भारत के साथ-साथ कई दूसरे देशों की लड़कियां और महिलाएं इसकी चपेट में आ चुकी हैं। बहुत सारे पाठकों को तो 2014-15 में केरल में हुई लव जिहाद की घटनाएं याद ही होंगी। उनकी जांच एनआईए ने की थी। उसमें भी निष्कर्ष निकला था कि इसके पीछे आतंकी संगठन आईएसआई का हाथ है और वह इसके लिए मुस्लिम लोगों को फंडिंग करते हैं। 2020 की बहुत सारी घटनाएं जिसमें एक महक कुमारी का अपहरण करके जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर अत्याचार किया। उसके लिए ब्रिटेन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और भारतीय प्रवासियों ने जस्टिस फॉर महक कुमारी के नाम से अभियान चलाकर विरोध-प्रदर्शन किया और कहा कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। भारत में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी पंथनिरपेक्षता और कानून की आड़ में लव जिहाद जैसी दुष्वृत्तियों को बढ़ावा देते आए हैं। यहां सवाल उठता है कि क्या हम और आप सिर्फ कानून के न्याय पर ही टिके रहेंगे या फिर अपने बच्चों के हित में उनकी परवरिश में लाड़-प्यार के साथ सतर्कता भी रखेंगे? हम सभी को अपने बच्चों को इस तरह से संस्कार देने चाहिएं कि वे मानसिक रूप से इतने सशक्त बन जाएं कि कभी भी कोई उनको बहला-फुसला न सके। खुद को बुद्धिजीवी मानने वालों को भी इन घटनाओं पर निष्पक्ष रूप से मंथन करना चाहिए और समाज का सही मार्गदर्शन करना चाहिए, ताकि फिल्म के अंत में जज की तरह उनके जीवन में भी पश्चाताप ही न रह जाए।

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