साइबर वर्ल्ड में जिहाद 3.0

पिछले सात दशकों में आतंकवाद की जो खेप पैदा हुई है उसके लिए वैचारिक स्तर पर भी काफी प्रयास किए गए हैं। जिहाद अलग-अलग स्तरों से होकर, अब बडे पैमाने पर आतंकी फैक्ट्री को गढ़ने का काम इंटरनेट कर रहा है लिहाजा जिहाद का मीडिया नेटवर्क खूब फल-फूल रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए वैचारिक जिहाद ने दस्तक दे दी है, जो साइबर वर्ल्ड में जिहाद 3.0 है।

यहां पर जिहाद को तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है, प्रथम चरण यानि जिहाद 1.0 जब घोड़ों की सवारी कर तलवारें, चाकू हाथ में लिए जिहादी आतंकवाद को फैलाया जाता था। भारत पर मुस्लिम आक्रमण और फिर हिन्दुओं की हत्या, लूट-पाट, बलात्कार, मतान्तरण नाना प्रकार के अत्याचार, कालान्तर में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें से मुहम्मद बिन कासिम का उदाहरण हमारे सामने आता है, जिसने भारत में मंदिरों को धवस्त करवाया, मूर्तियां तोड़ी गई, महलों को लूटा गया। देवल पर आक्रमण के बाद, ब्राह्मणवाद में हजारों की संख्या में हिंदुओं का नरसंहार किया और उनकी महिलाओं और बच्चों को अरब बाजारों में बेचा गया।

द्वितीय चरण, जिहाद 2.0 जब तकनीकी रूप से सक्षम हुआ तो आधुनिक टैंकों, विमानों, गाड़ियों, की सवारी कर आतंकी मनसूबों को अंजाम दिया गया जो आज भी जारी है। इसका एक बड़ा उदाहरण 9/11 अमेरिका पर आतंकी हमला, जिसमें वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, न्यूयॉर्क स्थित ट्विन टावर्स के साथ अल-कायदा आतंकवादियों ने 4 जेट विमान अपहरण कर 2 विमानों को टकरा दिया, जिसमें 90 देशों के लगभग 3000 से ज्यादा लोग मारे गए थे।

इंटरनेट के विकास के बाद और सोशल मीडिया के उभार के साथ जिहादी आतंकवाद अब सोशल मीडिया की सवारी कर रहा है। आतंकी संगठनों के विश्व भर में जिहाद फैलाने के लिए विभिन्न ऑनलाइन मैग्जीन, वेबसाइट, फेसबुक आईडी-पेज, फाइल शेयरिंग पोर्टल, ब्लॉग अकाउंट, ट्विटर अकांउट, यू-ट्यूब चैनल व सोशल मीडिया के अन्य प्लटफॉर्म पर सक्रिय हैं, जो जिहाद का तृतीय चरण यानि जिहाद 3.0 है। आज के समय में यह ज्यादा खतरनाक व घातक है क्योंकि इसके जरिए वैचारिकी रूप से जिहादी आतंकवाद फैलाया जा रहा है। परिणामस्वरुप कई लोग जिहादी विचारधारा से प्रभावित होकर आतंकी संगठनो का दामन थाम रहे हैं तो कई अप्रत्यक्ष रूप से आतंकी गतिविधियों में आए दिन संलिप्त पाए जाते हैं। पहले आतंक के लिए वैचारिकी रूप से, जिहाद के लिए प्रेरित करना एक चुनौती जैसी थी, मगर सोशल मीडिया के उभार के बाद यह चुनौती, जिहादियों के लिए अवसर के रूप बदल गई। अवसर इसलिए भी बना क्योंकि सोशल मीडिया का बेहतर उपयोग तो शिक्षित व्यक्ति ही कर सकता है, और शिक्षित व्यक्ति को वैचारिकी रूप से जिहाद के लिए प्रेरित करना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। आज समाज शिक्षित है, जो अमानवीय कुकृत्यों के प्रति सजग है, ऐसे में जिहाद 3.0 को अशिक्षा का परिणाम नहीं माना जा सकता है बल्कि यह परिणाम है जिहादी आतंकवाद, कट्टरवाद की लगातार खुराक का। यह परिणाम है गैर-मुस्लिमों के खिलाफ नफरत भरे विचार तैयार करने का।

जिहाद 3.0 का परिणाम कितना घातक हो सकता है, इसे केरल की एक घटना के माध्यम से समझा जा सकता है। नवंबर 2017 में केरल पुलिस ने आशंका जताई थी कि केरल में एक साल के भीतर करीब 100 लोगों ने इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) को ज्वाइंन किया। जिसमें पुलिस ने दावा किया था कि उनके पास संबंधित 100 लोगों के खिलाफ 300 से ज्यादा ऑडियो क्लिप, व्हाटसऐप मैसेज, टेलीग्राम मैसेज ऐप व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से आई. एस. में शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं। इन ऑडियो क्लिप में एक महिला का ऑडियो क्लिप भी शामिल था, जिसमें महिला ने अपने पति की मृत्यु के बारे में बताया, जो आई.एस.आई.एस. में शामिल हुआ था। ऐसी कई घटनाएं हैं जो भारत समेत पूरे विश्व में हो रही हैं, ये संकेत है जिहाद 3.0 का।

साइबर वर्ल्ड में जिहाद 3.0 का एक उदाहरण दाबिक ऑनलाइन मैग्जीन है, जिसका पहला प्रकाशन 5 जुलाई 2014 रमजान के समय हुआ। इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट द्वारा संचालित इस मैग्जीन का नाम दाबिक इसलिए है, क्योंकि इनके अनुसार ‘दाबिक शहर में एक चिंगारी जली हुई है और इसकी गर्मी अल्लाह की अनुमति से तीव्र हो जाएगी और तब तक तीव्र रहेगी जब तक क्रूसेडर आर्मी दाबिक में जल नहीं जाती’। मैग्जीन का पहला अंक द रिटर्न ऑफ खिलाफा है। मैग्जीन के अनुसार ‘खिलाफत की स्थापना का लक्ष्य हमेशा एक रहा है वह है, इस सदी के जिहाद का पुनरूथान’, यानि जिहाद 3.0। दाबिक मैग्जीन का एक अंक जस्ट टेरर नाम से है। इस आर्टिकल में कम्युनिस्टों के खिलाफ अफगान जिहाद समाप्त होने के बाद बंगाल यानि बांग्लादेश में जिहाद का उदय कैसे हुआ, को सिलसिलेवार तरीके से बताया गया है और लिखा है कि ‘बंगाल के मुसलमानों के बीच सैकड़ों वर्षों से चली आ रही आशा के बीच जिहाद की एक नई रोशनी पैदा हुई जो यूरोपीय उपनिवेशवाद और हिंदू सांस्कृतिक आक्रमण दोनों के प्रभावों के कारण शिर्क और बिद’अह में डूब गई थी’। भारत के प्रति जिहादी घृणित मानसिकता का अंदाजा आप इन चंद लाइनों से लगा सकते हैं, आर्टिकल में लिखा है कि ‘तथाकथित मुस्लिम भाईचारा का भारतीय उपमहाद्वीप, मूर्खता से यह सोचता है कि तौहीद की पुकार, जिहाद और खिलाफत को, शहादत से कुचला जाएगा। वे भूल गए थे कि इस उम्मा के पेड़ (जिहाद के पेड़) को पानी नहीं दिया जाता है, उसके शहीदों का खून दिया जाता है’। दाबिक के कुल 15 अंक है, आखिरी अंक 31 जुलाई 2016 का है। इसके बाद यह मैग्जीन बंद कर दी गई।

आई.एस.आई.एल. की एक और ऑनलाइन मैग्जीन दर-अल-इस्लाम, जिसका पहला अंक 23 दिसंबर 2014 को प्रकाशित हुआ। मैग्जीन के कुल 10 अंक हैं, और भाषा फ्रेंच। मैग्जीन में फ्रांस और पेरिस में आतंकवादी हमलों की प्रशंसा करने वाले लेख शामिल हैं।

अगस्त 2016 में इस्लामिक स्टेट का प्रमुख रणनीतिकार अबु मुहम्मद अल-अदनानी के मारे जाने के बाद दाबिक और दर-अल-इस्लाम मैग्जीन का स्थान ऑनलाइन मैग्जीन रूमियाह (रोम) ने ले लिया। रूमियाह नाम इसलिए है क्यूंकि इनके अनुसार ‘हदीस में मुहम्मद ने कहा है कि मुस्लिम, कुस्तुंतुनिया (कॉन्सटेंटिनोपल) और रोम (रोमन साम्राज्य) को जीतेंगे’। रूमियाह के कुल 13 अंक है। मैग्जीन में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ हमलों को उचित बताते हुए, काफिरों के छोटे-बड़े समूहों पर किन चाकूओं से कैसे हमला किया जाए, इसका विस्तृत विवरण मैग्जीन में मिलता है। मैग्जीन में एक आंकड़े के मुताबिक ‘बंगाल यानि बांग्लादेश व उसके आस-पास के क्षेत्रों में हिजरी कैलेण्डर के मुताबिक 1436-1437 के बीच 42 प्रतिशत हिंदू व बौद्ध लोगों की हत्याएं चाकू से की गई’। दूसरे अंक में लिखा है कि ‘काफिरों का खून तुम्हारे लिए हलाल है इसलिए इसे बहाओ’। मैग्जीन के तीसरे अंक में महमूद गजनवी द्वारा भारत पर आक्रमण का विस्तृत विवरण है। इस अंक में लिखा है कि ‘मूर्तियों को तोड़ना और उनके आदर्शों को जलाना जिहाद का एक बड़ा पहलू है जिसे सभी नबियों ने प्रचलित किया था और गजनवी ने भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ने, मूर्तियों को नष्ट करने व भारतीय भूमि पर इस्लाम फैलाने के लिए खुद को समर्पित किया’। महमूद का भारत पर आक्रमण से लेकर सोमनाथ मंदिर लूटने व मूर्तिभंजन का गुणगान मैग्जीन में किया गया है।

आतंकी संगठनों द्वारा संचालित ऑनलाइन मैग्जीन इस्तोक, कुस्तुंतुनिया, इन्स्पाइर, इस तरह की सभी मैग्जीन आपत्तिजनक तो हैं ही साथ ही जिहादी, मानवता के कितने बड़े भक्षक हैं, और गैर-मुस्लिमों के प्रति घृणा व कुकृत्यों को इन मैग्जीन में साफ देखा जा सकता है।

इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग करके जिहाद वैचारिक स्तर पर अपने पांव पसार रहा है, शारीरिक जिहाद फैलाने वालों को तो सेना मुठभेड़ कर मार गिरा रही है। वैचारिक आतंकवादियों को, जिहादियों को, वैचारिक स्तर पर सोशल मीडिया के जरिए ढेर किया जा सकता है, इसीलिए वैचारिक जिहाद का सोशल मीडिया पर तीव्र प्रतिकार होना आवश्यक है, और यह भी देश सेवा ही है।

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