आईसीटीसी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और सुरक्षा का प्रश्न

आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। सूचना और तकनीकी के क्षेत्र में तो दूसरों पर निर्भर रहने का जोखिम बिलकुल भी नहीं लिया जा सकता। सूचना, संचार एवं तकनीकी क्षेत्र सीधे-सीधे डाटा से जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में भी भारत अगर दूसरे देशों, खासकर चीन पर निर्भर रहेगा, तो आर्थिक एवं भू-राजनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा हमेशा दांव पर लगी रहेगी। लिहाजा, सूचना एवं तकनीकी क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं हो सकता।

मोदी सरकार ने अपने पहले ही कार्यकाल में डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को लागू करके भारत को आत्मनिर्भर बनाने के अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। कोरोना काल में आर्थिक मंदी के बाद से भारत को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत भी नये सिरे से महसूस की जाने लगी है। इस दिशा में अहम मोड़ तब आया, जब 15 जून को सीमा पर चीन के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे। उस समय चीन-विरोध में जो माहौल पैदा हुआ, उसमें भारत की जनता और सरकार के स्तर पर चीनी सामान के खिलाफ एक मजबूत जनमत बनना शुरू हो गया। भारत सरकार ने चीन को स्पष्ट संदेश भेजते हुए 59 चीनी मोबाइल ऐप्स को अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया। इसके दूसरे चरण में भारत सरकार ने चीन पर एक और डिजिटल स्ट्राइक करते हुए 47 एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। चीन के खिलाफ भारत सरकार का यह कदम अप्रत्याशित एवं साहसिक है। हालांकि यह तो शुरुआत भर है। अभी आगे एक लंबी लड़ाई सामने है।

भारतीय बाजार में आईसीटीसी क्षेत्र में अथाह संभावनाएं मौजूद हैं। इस साल जनवरी महीने में भारत के स्मार्टफोन बाजार ने अमेरिकी बाजार को पहली बार पीछे छोड़ दिया और वह चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार बन गया। भारत में फिलहाल 50 करोड़ 40 लाख इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जो कि विश्व में चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या है। एक अनुमान के अनुसार 2021 तक भारत की तकरीबन 59 फीसदी आबादी इंटरनेट से जुड़ चुकी होगी। लेकिन वायरलेस हैंडसेट और दूरसंचार तकनीक को लेकर हम अभी भी काफी हद तक आयात, खासकर चीन पर निर्भर हैं। यह आर्थिक  दृष्टि से बेहद खतरनाक स्थिति है। हम हर वर्ष अरबों रुपये चीन के खजाने में डाल रहे हैं और वह उसी धन का दुरुपयोग भारत और अपने दूसरे पड़ोसी देशों की मुश्किलों को बढ़ाने के लिए करता रहा है।

अगर भारतीय बाजार में चीनी मोबाइल हैंडसेट, कम्प्यूटर औैर दूसरे दूरसंचार यंत्र अपनी पैठ बनाने में कामयाब रहे हैं, तो इसके पीछे एक साथ कई कारण कार्य कर रहे होते हैं। सबसे पहले तकनीकी को अपनाने की बात आती है। इसे समझने के लिए आईसीटीसी क्षेत्र से संबंधित 4जी का ही एक उदाहरण लेते हैं। 4जी तकनीक आने पर चीनी मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियों ने बाजार की तमाम संभावनाओं को अपने पक्ष में लाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। वहीं उसकी भारतीय समकक्ष कंपनियों ने इस ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया। इसी का नतीजा है कि 4जी आधारित मोबाइल हैंडसैट बनाने के मामले में भारतीय बाजार का एक बड़ा हिस्सा आज भी चीन मोबाइल उत्पादक कंपनियों के कब्जे में है। सीमा पर तनाव पैदा होने से पहले तक भारतीय बाजार में तीन टॉप हैंडसैट ब्रैंड (शाओमी, ओप्पो और वीवो) चीन के थे। सीमा पर तनाव के दौरान इन कंपनियों को भारत में जरूर कुछ विरोध झेलना पड़ा, लेकिन अब पुनः पहले वाली स्थिति होने लगी है। नवीन तकनीकी को अपनाने के साथ-साथ ये कंपनियां अपने उत्पाद की ब्रांडिंग पर भी विशेष ध्यान देती रही हैं। ओप्पो और वीवो का कार्य देखने वाली बीबीके इलैक्ट्रॉनिक्स मार्केंटिग के लिए 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बजट को खर्च करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध दिखी। इसी तरह बाकी चीनी कंपनियां अपने उत्पादों की ब्रांडिंग के लिए कोर कसर नहीं छोड़तीं। चीनी कंपनियों की भारतीय बाजार में सफलता की यह भी एक कुंजी रही है। इसके उलट भारतीय कंपनियां इस मोर्चे पर भी पिछड़ी हुई नजर आईं।

तकनीकी निर्भरता को लेकर अगली सबसे बड़ी चुनौती चीन के भारत के खिलाफ चलाए जा रहे प्रोपगेंडा को लेकर है। सूचनाओं के जरिए लड़े जा रहे इस युद्ध में चीन और इसकी आईसीटीसी क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भारत को दुनिया के सामने नकारात्मक रूप से पेश करके इसकी सॉफ्ट पावर को लगातार टारगेट कर रही हैं। इसे हाल के एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। कुछ समय पहले चीनी कंपनी अलीबाबा के यूसी ब्राउज़र और यूसी न्यूज के खिलाफ इसी कंपनी में काम करने वाले पुष्पेंद्र परमार ने कंपनी के खिलाफ न्यायालय में केस किया है। उनका आरोप है कि यूसी न्यूज ने अपने पोर्टल पर भारत में उन खबरों को सेंसर करने की कोशिश की, जो चीन के खिलाफ थीं। जब उन्होंने कंपनी की इस साजिश के खिलाफ आवाज उठाई, तो उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया। इसके अलावा इसी कंपनी पर आरोप है कि यह कंपनी भारत में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए फेक न्यूज को बढ़ावा देती रही है। यह तो महज एक मामला है, चीनी कंपनियां सुनियोजित ढंग से लंबे समय से भारत के खिलाफ एजेण्डा आधारित सूचना प्रवाह को बढ़ावा देती रही हैं। दूसरा, जो भी चीनी कंपनियां भारतीय बाजारों में अपने मोबाइल हैंडसैट उतारती हैं, उसमें यूसी ब्राउज़र, यूसी न्यूज और ओपेरा मिनी जैसे सॉफ्टवेयर और ऐप्स पहले से ही इंस्टॉल रहते हैं। इसके कारण जाने-अनजाने भारतीय उपभोक्ता इसका उपयोग करते हैं और इसके पीछे के चीनी प्रोपगेंडा का शिकार भी होते रहे हैं।

आईसीटीसी क्षेत्र में दूसरों पर निर्भरता का सबसे बड़ा संकट राष्ट्रीय और लोगों की निजी सुरक्षा में सेंध से जुड़ा है। यह क्षेत्र सीधे-सीधे डाटा और राष्ट्रीय एवं निजी गोपनीयता से जुड़ा होता है। सूचना एवं तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोग हमेशा एक बात पर विशेष तौर पर जोर देते हैं कि गोपनीयता ही सब कुछ होती है। लेकिन जब हम विदेशी तकनीक को अपना रहे हैं और उस पर अपनी निजी एवं गोपनीय जानकारी साझा कर रहे हैं, तो हम एक तरह से सेवा मुहैया करवाने वाली कंपनियों एवं देशों को अपनी निजता और गोपनीयता में सेंधमारी का न्यौता ही दे रहे हैं। इस तरह से चीनी कंपनियों का डाटा पर जो नियंत्रण होता है, उसके जरिए वे लगातार भारत और भारतीयों की गतिविधियों पर निगरानी रखता है। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) पर बार-बार आरोप लगते रहे हैं कि वह आईसीटीसी कंपनियों के सहयोग से दूसरे देशों पर लगातार साइबर हमले करती रही है। 2013 में सीआईए के पूर्व प्रमुख मिशेल हैडन ने दावा किया कि ’चीन की दिग्गज दूरसंचार कंपनी हुआवे सुरक्षा को लेकर एक गंभीर खतरा है।’

वैश्वीकरण के बाद अब पूरी दुनिया में नि-वैश्वीकरण के प्रति रुझान बढ़ने लगा है। नि-वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों के बीच निर्भरता एवं एकीकरण में कमी आने लगी है। इसके तहत हर राष्ट्र सर्वप्रथम अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए प्रयासरत है। कोविड-19 महामारी के बाद से यह अवधारणा और भी मजबूती के साथ जोर पकड़ने लगी है। भारत को भी अब आत्मनिर्भता के क्षेत्र में मजबूती से कदम आगे बढ़ाने चाहिए, क्योंकि आत्मनिर्भरता का दूसरा कोई और विकल्प नहीं हो सकता। इस हेतु आईसीटीसी क्षेत्र निश्चित तौर पर भारत की प्राथमिकताओें में शुमार होना चाहिए।
 

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