भारतीय लोक को नकारता बॉलीवुड

भारतीय सिनेमा के सौसालों से ज्यादा के इतिहास में बड़ा हिस्सा ऐसी फिल्मों का रहा है, जो भारत के लोक को ध्यान में रखकर बनाई गई। पटकथा, संगीत से लेकर संवाद तक में यह खयाल रखा गया कि फिल्में समाज की भाषा में ही समाज के मुद्दे उठाएं। भारत में सिनेमा की शुरुआत ही राजा हरिश्चन्द्र फिल्म से हुई थी, जिसमें सतयुग के सत्यवादी हरिश्चन्द्र की कहानी का चित्रण था। सत्य और दानवीरता के लिए राजपाट छोड़ने, बेटे को गंवाने और पत्नी से भी श्मशान में कर वसूलने वाले हरिश्चन्द्र का चित्रण ऐसा था कि मूक फिल्म ने सब कुछ कह दिया। फिल्म के निर्माता दादासाहेब फाल्के समूचे बॉलीवुड के ही दादासाहेब कहलाए। इसके बाद भी वीरदुर्गादास, अमर सिंह राठौड़ जैसी फिल्मों का निर्माण किया गया। 17वीं शताब्दी के योद्धा वीर दुर्गादास पर बनी इस फिल्म में एक तरफ लोकश्रुतियों में विद्यमान रहे दुर्गादास की कहानी कही गई तो दूसरी तरफ गीतों में मेवाड़ी बोल भी सुनाई दिया। 'थाने काजलियो बनालूं' गीत मेवाड़ी अंचल के मिठास से परिचय कराता है।

यही नहीं 12वीं सदी के अप्रतिम योद्धा पृथ्वीराज चौहान पर भी 1959 में एक फिल्म बनी थी। ऐसी फिल्मों की एक श्रृंखला फिल्मी दुनिया में लंबी चली है, लेकिन हम देखते हैं कि इनमें वह स्टारकास्ट नहीं जुड़ी, जिन्हें फिल्म के चलने की गारंटी माना जाता है।  भारतीय सिनेमा का हम बारीकी से अध्ययन करें तो हम देखते हैं कि लगभग 1970 के दशक तक फिल्में ऐसी थीं, जो किसी न किसी स्वरूप में समाज का चित्रण करती थीं और उसी की भाषा में संवाद भी थे। देश गांवों में बसता था तो फिल्में भी गांवों का चित्रण करती थी या फिर गांव और संघर्ष के बीच की कहानी सुनाती थी। ऐसी ही एक बहुचर्चित फिल्म है, दो बीघा जमीन। जिसने अपने दौर में जमीन अधिग्रहण के चलते किसान की परेशानियों को अपने ढंग से उठाया।

फिर समय बीता और फिल्म इंडस्ट्री ने भी तकनीक के नए आयाम अपने साथ जोड़े। फिल्में रंगीन हुई और तकनीक जोरदार होती गई, लेकिन फिल्मों से लोकसंवाद पीछे छूटता गया। सिनेमा के शुरुआती दौर में जहां गांवों पर केंद्रित फिल्में बनती थी, वे अब गांवों में सुधार की बातें करनी लगी। अभिनेता शहरी हो गया और कथित भद्रलोक से आया शख्स गांव में सभ्यता की सीख देने लगा। गांव बुराईयों के केंद्र के तौर पर दिखाए जाने लगे। ठाकुरों की जिद, पंडितों की पोंगापंथी, साहूकारों की प्रताड़ना ही मानो गांव का सच हो गई और शहर से आए हीरो से ही उसका कल्याण था। भले ही यह सच नहीं था और न है, लेकिन फिल्में यही कहती रही और टीवी का सत्य समाज के सत्य से परे हो गया। शायद यही कारण है कि अब फिल्में समाज का आईना नहीं रही बल्कि समाज में किसी गलत हरकत पर यह कहा जाने लगा कि यह फिल्म नहीं है, जो कुछ भी करोगे।

दरअसल भारतीय सिनेमा का हम बारीकी से अध्ययन करें तो यह एक तरह से मूल परंपरा को नकारने की व्यवस्था रही है। जिस हॉलीवुड के पीछे भारतीय सिनेमा हमेशा चलने की कोशिश करता रहा है, उसने भी यूनान, मिस्र और रोम जैसी सभ्यताओं का चित्रण अपनी फिल्मों में लोककथाओं के आधार पर ही किया है। बहुचर्चित फिल्म ट्रॉय की ही बात करें तो यह होमर की रचना इलियाड पर आधारित है, जिसमें यूनानी वीर एकलिस की वीरता की गाथाएं हैं। होमर की यह रचना कोई ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं है, लेकिन लोककाव्य होने और समाज में उसकी मान्यता के आधार पर फिल्म में उसे जस का तस उतारा गया है। फिल्म की सफलता भी बताती है कि लोककाव्य पर आधारित यह रचना पश्चिमी समाज में कितने गहरे तक पैठ किए हुए है। इसके अलावा 300 मूवी को बनाते हुए भी इतिहास के उन चर्चित तथ्यों का पूरा सम्मान किया गया। भारत में ऐसी फिल्में विरले ही बनती हैं और यदि बनी भीं तो एक अलग तरह के चित्रण के दबाव में बनती हैं।

निर्माता-निर्देशक पर यह दबाव रहता है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में तैयार सेकुलरिज्म की अवधारणा को 10वीं, 12वीं या 17वीं शताब्दी के किसी नायक पर बनी फिल्म से चोट न पहुंचे। या फिर 326 ईसा पूर्व के चाणक्य को दिखाने से कहीं गंगा-जमुनी तहजीब की आभासी अवधारणा न टूट जाए। यहीं यह सवाल है कि आखिर 10वीं शताब्दी या फिर ईसा पूर्व के किसी नायक को जब हम आज की राजनीतिक अवधारणा के बीच फिट करेंगे तो क्या इतिहास से न्याय होगा? उदाहरण के तौर पर हम पद्मावत फिल्म की ही बात करें तो निर्माता-निर्देशक रानी पद्मावती के नाम से दर्शकों को तो सिनेमा हॉल तक खींचना चाहते हैं, लेकिन चरित्र और कहानी के चित्रण की खामियों पर यह कहकर पर्दा डालते हैं कि हमने इतिहास दिखाने के लिए फिल्म नहीं बनाई, यह विशुद्ध मनोरंजन है। इतिहास के तथ्यों से कैसा मनोरंजन? मौजूदा भारतीय सिनेमा का यही चरित्र है, जो उसे समाज की बात को उसकी ही बोली, भाषा और मान्यताओं में कहने नहीं देता।

ऐसा ही भारत की रचनाओं को भी नकारने का स्वभाव भारतीय सिनेमा में दिखता है। ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल और बिहार में प्रशासक के तौर पर काम करने वाले सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने बुंदेलखंड के योद्धाओं आल्हा और ऊदल पर लिखे काव्य आल्हखंड की तुलना होमर के इलियाड से की है। यह वही इलियाड है, जिसके आधार पर ट्रॉय फिल्म बनी और एकलिस और हेक्टर जैसे योद्धाओं की कहानी का चित्रण किया गया। भले ही ग्रियर्सन को आल्ह खंड में संभावनाएं दिखीं, लेकिन भारतीय सिनेमा इसे नहीं स्वीकारता। इसके अलावा राजतरंगिणी, पद्मावत या फिर पृथ्वीराज रासो जैसे अन्य ग्रंथों में भी ऐसी तमाम संभावनाएं मौजूद हैं, जिनके चित्रण के जरिए विश्व स्तरीय सिनेकृतियां प्रदर्शित की जा सकती हैं। यह समाज और सिनेमा के एक-दूसरे के उलट चलने जैसी स्थिति है। समाज की मान्यताएं सिनेमा स्वीकार नहीं कर रहा है और सिनेमा की कृतियों को समाज खुद से नहीं जोड़ता। ऐसे में सिनेमा समाज का दर्पण कैसे बनेगा? यह शोचनीय विषय है।  

क्रेडिट दिए बिना लोकसंगीत की लोकप्रियता को भुनाया: भारतीय सिनेमा की एक प्रवृत्ति यह भी दिखती है कि वह अपनी सुविधा के लिए लोकसंगीत का इस्तेमाल तो करता है, लेकिन उसे प्रामाणिकता न मिले, शायद इसलिए क्रेडिट देने से बचता है। सन् 2008 में आई फिल्म ओए लकी, लकी ओए में 'तू राजा की राजदुलारी, मैं सर्प लंगोटे आला सू' गीत को लिया गया है। जंगम साधुओं का यह गीत हरियाणा, पंजाब समेत उत्तर भारत के बड़े हिस्से में लोकप्रिय हैं। इस एक गीत को ही सैकड़ों गायकों ने अपने-अपने तरीके से गाया है। इसकी लोकप्रियता को भुनाते हुए फिल्म में इस गीत को लिया गया है, लेकिन कहीं भी यह क्रेडिट नहीं दिया गया कि आखिर यह कहां से आया और हमने इसे कहां से हासिल किया। इसी तरह फिल्म मंगल पांडे के गीत मंगल-मंगल की तर्ज आल्हा से ली गई है, लेकिन यह क्रेडिट नहीं दिया गया कि आखिर इसे कहां से लिया गया है।
 

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