जानलेवा बहसों का शोर...

स्वाधीनता दिवस के ठीक दो दिन पहले तेरह अगस्त की शाम को कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी का एक टेलीविजन बहस के बाद निधन होने के बाद लगा कि टेलीविजन चैनल और राजनीतिक दल मिलकर रोजाना शाम को रक्तचाप और धड़कनें बढ़ाने वाली बहसों के लिए ऐसा फॉर्मूला निकालने की तरफ बढ़ेंगे, जिससे भावी बहसें ना सिर्फ मुद्दा आधारित हों, बल्कि उनके मंथन के बाद राष्ट्र और समाज को कुछ मिलने की उम्मीद बढ़े। जिससे रक्तचाप नियंत्रित रहे और हंगामा जैसी स्थितियों से बचा जा सके। लेकिन दुर्भाग्यवश राजीव त्यागी का निधन भी बेकार जाता दिख रहा है। राजनीतिक दल इस दिशा में आगे बढ़ते नहीं दिख रहे हैं। रही बात टेलीविजन चैनलों की तो पिछले करीब एक दशक में उनका चरित्र ही इस तरह से विकसित हुआ है कि अगर उनकी बहसों से दर्शकों और चैनलों के अपने कार्यक्रम निर्माताओं की धमनियों में बहते खून में तेजी ना आ पाए तो उन्हें शायद ही चैन पड़े। 
राजीव त्यागी चूंकि कांग्रेस के प्रवक्ता थे, लिहाजा कांग्रेस से उम्मीद की जानी चाहिए थी कि शोक की घड़ी में वह कुछ गंभीरता दिखाएगी। लेकिन उसके कार्यकर्ताओं और छुटभैये नेताओं ने राजीव त्यागी के निधन के लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें निशाने पर लेना शुरू कर दिया। उन्होंने जगह-जगह उनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप था कि आजतक चैनल के जिस कार्यक्रम के बाद राजीव त्यागी को हृदयघात पहुंचा, उसमें भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने जयचंद कहा था। हालांकि कांग्रेस का यह आरोप शायद ही किसी के गले उतरे। दर्शक और पत्रकार भी यह शायद ही स्वीकार कर पाएं कि राजीव त्यागी का निधन सिर्फ इस कथन के बाद लगे सदमे से हो गया। जो लोग टेलीविजन के कार्यक्रम बनाते रहे हैं, उन्हें पता है कि कुछ साल पहले तक स्टूडियो में बैठे विरोधी दलों तक के प्रवक्ता जब कार्यक्रम में ब्रेक होता था तो आपस में चुहल करने लगते थे और एक-दूसरे से ऐसे बात करते थे, मानो उनके बीच कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जैसे ही पैनल कंट्रोल रूम से कार्यक्रम शुरू करने के लिए उलटी गिनती शुरू हो जाती थी, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता या स्टूडियो में आए मेहमान ऑन रिकॉर्ड वाली अपनी भूमिकाओं के लिए ठीक उसी तरह अलर्ट मोड में आने लगते थे, जैसे किसी नाटक में पात्र पर्दा उठने के बाद अपनी भूमिकाओं के लिए तैयार होते हैं। 
लेकिन हाल के दिनों में ऐसी स्थिति नहीं रही। कुछ वर्षों में जिस तरह अपनी बहसों की ओर कार्यक्रमों के प्रोड्यूसरों, चैनलों के नीति-नियंताओं और एंकरों ने चीखमचिल्ली का रास्ता अख्तियार किया है, उससे टेलीविजन की बहसें मछली बाजार जैसी बनती गई हैं। रही-सही कसर कार्यक्रमों में शामिल किए जा रहे स्तरहीन लोगों की भाषा ने पूरी कर दी है। टेलीविजन के नियंता मान चुके हैं कि दर्शकों के समर्थन की बड़ी रेटिंग इसी तरीके से मिल सकती है, लिहाजा चीख, चिल्लाहट का जोर बढ़ा है। इन दिनों समाचार टेलीविजन चैनलों के नियंताओं ने अपनी बहसों के लिए फॉर्मूला ही बना लिया है। मसलन जब दो समुदायों से संबंधित कोई मसला हो, तो एक तरफ से वे मुस्लिम उलेमा बैठाते हैं तो दूसरी तरफ से हिंदू पुजारी या पंडित। इसके लिए उन्होंने फॉर्मूला बना दिया है। उलेमा का मतलब बड़ी दाढ़ी, आंखों में सुरमा और पंडित-पुजारी के लिए गेरूआ वस्त्रधारी ललाट पर बड़ा टीका और दाढ़ीधारी सज्जन। दोनों ही समुदायों के कथित प्रतिनिधि जितना ज्यादा भयानक लगेंगे, टेलीविजन के नियंता मानते हैं कि उनका टेलीविजन स्क्रीन उतना ही आकर्षक लगेगा। चूंकि ऐसी बहसों और गेटअप में आने के लिए अब दोनों तरफ के गंभीर लोग बचने लगे हैं तो जानकारीहीन लोगों की पौ बारह हो गई है। अब बहसों में राजनीतिक दलों के उन प्रवक्ताओं को ही तरजीह दी जाने लगी है, जो आक्रामक ढंग से अपनी बात रखें। भले ही उनके तर्क गलत हों। तर्कशील और गंभीर बात करने वाले, स्वर में ठहराव वाले नेता अब टेलीविजन बहसों के लिए आकर्षक नहीं रह गए हैं। अगर कभी ऐसे नेता, विशेषज्ञ या जानकार बुला लिए जाते हैं और गुरू-गंभीर आवाज में तार्किक ढंग से अपनी बात रखने लगते हैं तो उन्हें पीछे से टेलीविजन चैनल के मेहमान संयोजक की तरफ से सुझाव आने लगता है, सर जरा तेज बोलिए...जरा चीखिए...जरा चिल्लाइए...ऐसे माहौल में जो लोग अपना रक्तचाप बढ़ाना नहीं चाहते, वे टेलीविजन की बहसों से बचने लगे हैं। 
हिंदी समाचार चैनलों की कथित बहसों पर निगाह डालिए, यहां भी कुछ ऐसी ही स्थिति आपको नजर आएगी। टेलीविजन की इन कथित बहसों पर जब भी अपनी निगाह जाती है, गांवों में कुत्ते के बच्चों के साथ ग्रामीण बच्चों की ठिठोली याद आ जाती है। गांव के कुछ किशोरवय बच्चे आनंद के लिए कुत्ते के दो बच्चों को गर्दन से पकड़ कर उनके थूथन से थूथन को जबरदस्ती भिड़ाते हैं..यह भिड़ाना तब तक नहीं थमता...जब तक आजिज आकर कुत्ते के दोनों बच्चे आपस में लड़ने न लगें...इसके बाद तालियां बजने लगती हैं और उपस्थित बाल समुदाय इस लड़ाई का आनंद उठाने लगता है। यह आनंद उठाने की टेलीविजन स्टूडियो तक पहुंची प्रवृत्ति का ही कमाल है कि कुछ चैनलों पर ऑन एयर मारपीट हो चुकी है। कुछ साल पहले एक चैनल में एक कथित उलेमा ने एक महिला से अभद्रता की थी तो एक चैनल के कार्यक्रम में एक राजनीतिक प्रवक्ता ने अपने विरोधी पर गिलास का पानी फेंक दिया था।
याद आती है 2006 की जी न्यूज की एक बहस। उन दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने महिलाओं के लिए कोई कानून बनाया था। उस पर रात के कार्यक्रम में बहस होनी थी। उस कार्यक्रम में भारतीय जनता पार्टी का पक्ष रखने उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी और तब भाजपा के राज्यसभा सदस्य वीपी सिंघल आए थे। उन्होंने जैसे ही अपने सामने भोपाल से बहस के लिए उन दिनों मशहूर हुए पटना के प्रोफेसर और लव गुरू मटुकनाथ को देखा तो हत्थे से उखड़ गए। उन्होंने साफ शब्दों में जी के प्रोड्यूसरों से कहा था कि मेरा स्तर उस प्रोफेसर से बहस करने का नहीं है। दुर्भाग्यवश अब ऐसी हिम्मत भी राजनेता या जानकार कम दिखा पाते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि अब अवधारणाओं का खेल बढ़ गया है। कोई भी राजनीतिक दल अपनी छवि कमजोर होते नहीं देख सकता। बदले माहौल में माना जाने लगा है कि अगर आप स्टूडियो या बहस छोड़कर भागते हैं तो इसका मतलब आप कमजोर हैं। न्यूज मेकर समझते हैं कि इससे उनका युवा मतदाता निराश होता है। उन्हें भी महसूस होता है कि अगर वे चीखते-चिल्लाते हैं तो उनका युवा मतदाता खुश होता है। इसलिए वे टेलीविजन चैनलों के चीखमचिल्ली के खेल में कई बार इस वजह से भी न चाहते हुए शामिल होते हैं।
वैसे भी मौजूदा दौर में टेलीविजन नियंता हो गया है। उसका सामाजिक और अवधारणा बनाने का दबाव एवं देखते ही देखते स्टार बनाने की उसकी इतनी ताकत हो गई है कि चाहकर भी राजनीतिक दल इससे दूर नहीं हो पाते। टेलीविजन के पर्दे का आकर्षण इतना बड़ा है कि गंभीर व्यक्ति भी उसके सामने आने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। अपनी ताकत और राजनीतिक दलों-जानकारों की मजबूरी का फायदा टेलीविजन चैनल उठा रहे हैं। यह दबाव का अर्थशास्त्र ही है कि रिपब्लिक चैनल के अर्णव गोस्वामी अपने कार्यक्रम ‘पूछता हैभारत’ में ना सिर्फ चिल्लाते हैं, बल्कि कार्यक्रम में शामिल राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं और नेताओं को उकसाते भी हैं। हालांकि उनका यह कृत्य देखकर कई बार डर भी लगता है कि राजनेताओं का जो होगा, सो होगा...उनका ही रक्तचाप कहीं अपशगुनी स्तर तक न बढ़ जाए। 
भारतीय समाचार टेलीविजन चैनलों के विकास के दौर में दरअसल जो हस्तियां जिम्मेदार पदों पर रहीं, उनमें से ज्यादातर को बौद्धिकता से लेना-देना कम रहा। उन्हें मुद्दों से ज्यादा नौटंकी शैली में ही अपना विकास दिखा। चूंकि टेलीविजन चाक्षुष माध्यम है, लिहाजा उन्होंने उस दौर के हिंदी सिनेमा से प्रेरणा ली। जिसकी सफलता का राज ग्लैमर और मसाला रहा। रचनात्मक जन माध्यम के तौर पर विकसित करने में भी उनकी दिलचस्पी कम रही। इसीलिए टेलीविजन मसाला फिल्मों की तरह बढ़ता गया और उसकी बहसें चीखमचिल्ली के भयावह स्तर तक पहुंचती गई।
राजीव त्यागी के निधन के बहाने अव्वल तो होना चाहिए था कि राजनीति, टेलीविजन जगत की हस्तियां और जानकार ऐसे फॉर्मूले की तरफ बढ़ने की कोशिश करते, जहां हंगामे से ज्यादा मुद्दों पर जोर रहता। लेकिन दुर्भाग्यवश अभी ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। 
 

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