Samvadsetu News

अरबी अलतकिया के बीच खशोगी

अलतकिया एक अरबी शब्द है। अलतकिया के अलग-अलग आशय निकाले जाते हैं, लेकिन प्रायः इसका उपयोग नकारात्मक और अनैतिक संदर्भों में ही किया जाता है। अलतकिया के अंतर्गत झूठ, बर्बरता और धोखे को रणनीतिक सिद्धांत के तौर पर न केवल धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है, बल्कि इसे नैतिक दृष्टि से जायज भी ठहराया जाता है। जिहादी युद्धों के दौरान दुश्मन से झूठ बोलना, उसे धोखे में रखना, मौका पाते ही उसका सफाया करना, निश्चित समय के लिए अन्य पंथों के सिद्धांतों को मानने का ढोंग करना या जब तक अपनी स्थिति कमजोर है तब तक अन्य मतों और मतावलम्बियों को भी अपने बराबर मानना जैसे काम को अलतकिया की रणनीति के अंतर्गत किए जाते रहे हैं।
ऐसा लगता है कि अरबी मानसिकता में अलतकिया का सिद्धांत अब गहरे तक बैठा हुआ है। वाशिंगटन पोस्ट के लिए कार्य कर रहे पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या जिस बर्बरता के साथ की गई और हत्या पर लीपा-पोती करने के लए सऊदी अरब की तरफ से जिस तरह झूठ का अम्बार खड़ा किया गया, वह इस बात की तस्दीक करता है।
झूठ के प्रति सऊदी अरब का यह आकर्षण तब भी दिखा था, जब सऊदी अरब ने कतर के समक्ष कुछ समय पूर्व शांति के लिए कुछ शर्ते रखी थी। उस समय एक शर्त ने पूरी दुनिया को चैंका दिया था। यह शर्त थी अल-जजीरा को बंद करना। सामान्यतः दो देशों के सम्बंधों की आंच से मीडिया बची रहती है, लेकिन सऊदी अरब ने इस मर्यादा को लांघकर किसी न्यूज चैनल को बंद करने की छोटी मांग को शांति-प्रस्ताव का हिस्सा बना दिया। अलतकिया के प्रति आकर्षित मानसिकता ही झूठ और धोखे के बचाए रखने के लिए पत्रकारिता और पत्रकारीय संस्थानों को इस हद तक निशाना बन सकती है।
अब अमेरिका में रह रहे 59 वर्षीय पत्रकार जमाल खशोगी की निर्मम हत्या ने सउदी अरब फिर से पत्रकारीय कारणों से चर्चा में है। खशोगी सऊदी राजपरिवार के कट्टर आलोचक थे और वह सलमान की युवराज के रूप में ताजपोशी सऊदी अरब को छोड़कर और अमेरिका चले गए। वह अमेरिका से इस्ताम्बुल में रहने वाली अपनी तुर्क मंगेतर हातिज चेन्जिज से विवाह करने तुर्की गए हुए थे, यहीं पर 2 अक्टूबर को उनकी हत्या कर दी गई। उन्हें विवाह के सिलसिले में सऊदी कॉन्सुलेट से कुछ दस्तावेज चाहिए थे।
खशोगी की हत्या जिस बर्बरता के साथ की गई, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। तुर्की के दैनिक अखबार ‘येनी सफाक’ ने इस्ताम्बुल के सऊदी कॉन्सुलेट से आईं आवाजों की एक बहुचर्चित ऑडियो रिकार्डिंग का उल्लेख करते हुए लिखा था कि पूछताछ के समय उनकी उंगलियां काट दीं और बाद में उनका सिर भी धड़ से अलग कर दिया।
अधिकांश हलकों में इस हत्या के लिए रियाद को जिम्मेदार ठहराया गया। और ऐसा करने के काई करण थे। हत्या के बाद कमांडो टीम के मुखिया माहर अब्दुल अजीज मुतरेब ने युवराज मोहम्मद बिन सलमान के कार्यालय-प्रमुख बदर अल-असाकर को चार बार फोन किया। एक फोन युवराज के भाई खालेद बिन सलमान को भी किया गया, जो वाशिंगटन में सऊदी अरब के राजदूत हैं।
प्रारंभ में सऊदी अरब ने इस हत्याकांड में किसी तरह का हाथ होने से साफ इनकार कर दिया। सऊदी अरब पहले तो यह कह रहा था कि खशोगी की हत्या हुई ही नहीं है, वे जीवित हैं। जब इस झूठ को सच सिद्ध करना असंभव हो गया तो उसने यह कहना शुरू कर दिया कि कॉन्सुलेट में गर्मागर्मी और हाथापायी हो जाने से हुई एक दुर्घटना में खशोगी की जान चली गयी। सऊदी के शाह और युवराज ने खशोगी के भाई और पुत्र को राजमहल में बुला कर खशोगी की मृत्यु पर अपना शोक प्रकट कर मामले को ठंडा करने की कोशिश की, लेकिन इसके लिए युवराज सलमान को जिम्मेदार मानने से इनकार कर दिया।
बाद में प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या को नृशंस अपराध बताकर अपना दामन पाक-साफ होने की कोशिश की। उन्होंने कहा है कि उनका देश तुर्की के अधिकारियों का सहयोग कर रहा है और न्याय होगा। उन्होंने कहा कि खशोगी हत्या मामले में सभी जिम्मेदार अपराधियों को सजा दी जाएगी।
उन्होंने इस सफाई के लिए अपने ड्रीम प्रोजेक्ट फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव फोरम के मंच को चुना। खशेागी की हत्या के बाद कई पक्षों ने इस आयोजन का बहिष्कार कर दिया था। उन्होंने कहा कि सभी सऊदी लोगों के लिए यह अपराध दुखदायी है और यह पूरी दुनिया के हर व्यक्ति के लिए दर्दनाक और नृशंस है। जिन लोगों ने इस अपराध को अंजाम दिया है उन्हें जिम्मेवार ठहराया जाएगा। आखिर में न्याय की जीत होगी।
हत्या जिस सुनियोजित ढंग से की गई थी, और प्रमाण जिस तरह से सामने आ रहे थे, उससे कारण सलमान को अपनी सफाई देने के लिए खुद आना पड़ा। न्यूयार्क टाईम्स के मुताबिक जमाल खशोगी पर दूतावास में घुसने के दो मिनट के भीतर ही हमला किया गया और सात मिनट के भीतर उनकी मौत हो गई। वाशिंगटन पोस्ट की एक खबर के अनुसार सलमान के भाई खालिद बिन सलमान ने खाशोगी से फोन पर कहा था कि वे इस्ताम्बुल स्थित सऊदी दूतावास जाएं और अपनी शादी से संबंधित  कागजी कार्यवाही पूरी कर लें। खालिद ने उनसे सुरक्षा का वादा भी किया था। खालिद अमेरिका में सऊदी राजदूत हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन ने दावा किया कि तुर्की के पास ऐसे पक्के प्रमाण हैं जो साबित करते हैं कि दो अक्टूबर को इस्ताम्बुल के सऊदी कॉन्सुलेट में पत्रकार जमाल खशोगी की मृत्यु एक सुनियोजित साजिश थी। तुर्की के राष्ट्रपति के अनुसार हत्या की योजना ‘कई दिन पहले ही’ बना ली गई थी। उन्होंने दावा किया योजना को साकार करने के लिए छोटे आकार के दो चार्टर्ड जेट विमानों से 15 सदस्यों वाली तीन कमांडो टीमें इस्ताम्बुल पहुंची हुई थीं। एर्दोआन के मुताबिक सऊदी अरब से आये 15 कमांडो के अलावा कॉन्सुलेट के तीन अधिकारियों की भी उन लोगों के तौर पर पहचान की गई है।
खशोगी की हत्या में कई दृष्टिकोणों के साथ सभ्यतागत आयाम भी शामिल हैं। हालांकि कहीं भी इस घटना को सभ्यतागत तरीके से न लिया गया और न ही विश्लेषण किया गया। तुर्की द्वारा इस मसले को लेकर अपनाए गए रवैये को बिना सभ्यतागत आधारों के नहीं समझा जा सकता। तुर्की और सऊदी अरब की प्रतिद्वंद्विता की सदियों पुरानी है। इस प्रतिद्वंद्विता का कारण इस्लाम की राजनीति है। 18 वीं सदी तक एशिया से जाने जाने वाले इलाके पर ओटोमन सल्तनत का राज था। इसका केंद्र इस्ताम्बुल था। मक्का और मदीना सिर्फ धार्मिक वजहों से अहम थे, उनकी सियासी अहमियत नहीं थी। फिर 1740 में अब्द अल वहाब का उदय हुआ जो असल इस्लाम को वापस लाने का नारा लेकर आए। यही विचार धारा सलफी इस्लाम का आधार बनी। सलफी मुसलमान शिया मुसलमानों और सुन्नी तुर्कों पर हमला बोलते रहे और सऊदी शासकों की नजदीक रहे। तुर्की और सऊदी अरब के बीच का टकराव इसी कारण रहा।
वर्तमान संदर्भों ने इस टकराव को हवा दी है। सऊदी अरब उस वहाबी इस्लाम का सबसे बड़ा निर्यातक माना जाता है,जो इस्लामिक स्टेट जैसी आतंकी संगठन की सोच को बढ़ावा देता है। सऊदी अरब सदियों से शिया-सुन्नी नस्लीय हिंसा को हवा देता है, यमन में हो रहे नरसंहार का कारण भी सऊदी अरब है।
खशोगी की बर्बर हत्या मीडियाई संदर्भों में अलतकिया का प्रयोग है और इस्लामिक राजनीति की वर्तमान स्थिति को समझने का एक अच्छा जरिया भी। अलतकिया का उपयोग भारत में जहां-जहां हो रहा है, यदि हम उन संदर्भों को पहचान कर पाएं तो यह भारतीय मीडिया और भरातीय सभ्यता बर्बरता का शिकार होने से बच सकती है।
 

05/12/2018