भारतीय कला में स्वातंत्र्य चेतना

कलाएँ व्यक्ति में स्वातंत्र्य चेतना का विकास करती हैं। चेतना के बिंब अलग-अलग माध्यमों में अभिव्यक्त होते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जब तिलक, गोखले, सावरकर, गांधी और अनेक क्रांतिकारी अपनी आहुतियाँ दे रहे थे उस समय कला साधना करने वाले कलाकार भी पीछे नहीं रहे। तत्कालीन विभिन्न कलाकारों ने भारतीय विषयों एवं परिवेश को अपनी रचनाओं में उतारा। कई पौराणिक विषयों को चित्रित करने वाले प्रथम कलाकार राजा रवि वर्मा ने पाश्चात्य तकनीक में स्व की अनुभूति करायी।
तैल रंग तकनीक में देवी-देवताओं के चित्रों ने भाषाओं की दीवारों को लाँघते हुए सम्पूर्ण भारत के जनमानस को आस्थावान बनाया। उस समय अधिक से अधिक चित्रों को छापने और लोगों तक पहुचाने हेतु जर्मनी से लिथोग्राफ मशीन मंगवायी गयी। ये चित्र पाश्चात्य मास्टर्स कलाकारों की तुलना में भले ही कमतर ठहरते हों लेकिन देवी-देवताओं के चित्रों ने भारत के शहरों से लेकर गाँव-देहात तक लोगों के अन्दर कहीं न कहीं भारतीय अस्मिता को लेकर विमर्श का आन्तरिक वातावरण निर्मित किया। हाँ इन चित्रों के उत्पादन में पैसे बनाने का भाव भी जरुर रहा होगा परन्तु केवल अर्थलाभ ही रहा, ऐसा नहीं था। 
इन चित्रों ने आम जन के दैव योग विश्वास को मजबूत किया। यही विश्वास आगे चलकर लोकगीतों में गाँधी, जवाहर या क्रांतिकारियों को देवता रुप में उद्धारक बन देश में अवतार के उदाहरण रुप में मिलता है। भारतीय प्राणधारा उसकी आस्था है। वह आस्था भारत माता के रूप में, 'ईशावास्यमिदम् सर्वम्', या 'आत्मवत सर्वभूतेषू' के रूप में सर्वदा मानस में प्रवाहित होती रही जिसने अहिंसक आन्दोलन की पीठिका निर्मित की। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के विफल हो जाने के बाद अंग्रेजों ने सुनियोजित ढंग से, अधिकाधिक प्रहार भारतीय संस्कृति, उसके आस्था के केन्द्र देवरुपों पर की। आम जनहृदय को रुप उपासना के साथ शक्ति संकलन का कोई आधार चाहिए था जो प्रथमतः राजा रवि वर्मा के चित्रों में प्रतीत हुआ। 
दूसरा सबसे बड़ा प्रभाव पैदा किया बंगाल में टैगोर परिवार ने। रवीन्द्रनाथ टैगोर के गीत जहाँ आध्यात्मिकता को पुनः स्वर दे रहे थे वहीं अवनीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय स्वाभिमान को कला में खोज रहे थे। उन्होंने वागेश्वरी शिल्प प्रबंधावली में भारतीय षडंग की पुनः सरल व्याख्या की। वाश तकनीक में कोमल भावप्रवणता और स्वदेशी मूल्यों की अभिव्यक्ति को कागज पर उतारा। वे अजंता की चित्रशैली से गहरे प्रभावित थे फिर भी उन्होंने उसकी सीधी नकल नहीं की बल्कि चित्रों में भाव और सरसता को उतारने के लिए वाश तकनीक(जल द्वारा)को उपयुक्त माना। यह भावसौम्यता रवि वर्मा के यहाँ नहीं थी। पहली बार भारतमाता की कल्पना को अवनीन्द्रनाथ ने चित्र में उतारा। गेरुआ वस्त्र, चार हाथ जिसके हाथों में क्रमशः माला, धान की बाली, पुस्तक और वस्त्र लिये हुये पैरों के नीचे श्वेत कमल है। चेहरे भारतीय यथार्थ को दर्शाते हैं।
उन्होने भारतीय भावबोध जगाने वाले विषयों को चित्रित किया। आगे चलकर उनके शिष्यों नन्दलाल बोस, क्षितिन्द्रनाथ मजूमदार, असित कुमार हाल्दार, मुकुल डे, शारदा उकील और उसके मनीषी डे ने स्वदेशी भाव, राष्ट्रीयता के स्वर को अपनी कला में स्थान दिया।  इसे बंगाल स्कूल के नाम से जाना गया।
जब गाँधीजी की स्वदेशी से प्रेरणा लेकर लोग स्वतंत्रता आंदोलन में नये भारत की कल्पना कर रहे थे उस समय बंगाल स्कूल के कलाकार भारतीय छवियों को ग्रामीण भारत और उसकी आस्था-आध्यात्मिकता को अपने रंगों-रेखाओं में समाहित कर तत्कालीन अंग्रेज विद्वानों और पाश्चत्य कला जगत के समानांतर भारतीय कला मेधा का स्वरुप रच रहे थे। नन्दलाल बोस द्वारा दांडी मार्च(1930ई.) विषय पर  लिनो कट माध्यम से श्वेत-श्याम रंग में बनाया चित्र बहुत प्रसिद्ध हुआ। यह चित्र गाँधी जी की संकल्पशक्ति और आगे चलती कृषकाय की महान यात्रा को दर्शाती है।  1938 ई.में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में नन्दलाल बोस एवं उनके शिष्यों द्वारा चित्रित पंडाल आज भी कलाकार की स्वातंत्र्य चेतना का परिचायक है। नन्दलाल के चित्रों में अजंता की लयात्मकता और अद्भुत् रेखांकन मिलता है।  उनके शिष्यों की भी सुदीर्घ परम्परा रही जिन्होंने भारतीयता के स्वर को नव्यता प्रदान की।
देशकाल और समकालीन परिस्थितियाँ रचनाकारों पर अपना प्रभाव डालती हैं। तत्कालीन व्यथाओं को गढ़ने हेतु उसी समय में ही रुप-प्रतिरुप गढ़ने पड़ते हैं। यह कलाकार का अपना विवेक-धर्म  है कि वह अपने मुहावरे का रुप साम्य किस तरह खोजता है। यदि उसकी जड़ें-अनुभव समाज की गहराई तक हैं तो यथार्थ का विरल रुप देखने को मिलता है परन्तु यदि केवल यथार्थ ही एकमात्र आन्दोलन बन जाय और आँखों से दिखने वाली घटनाएँ या दृश्य मात्र ही सत्य बन जायें तो कलाकार एकांगी होता जाता है। 
देश के स्वतंत्र होने के बाद कला क्षेत्र में बंगाल स्कूल के पुराना होने और कुछ नये यथार्थ रचने की खोज में मुम्बई में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना होती है जिसमें एफ. एन. सूजा, एम. एफ. हुसैन, आरा, अकबर पदमसी, सैय्यद हैदर रजा, बाकरे, गाडे प्रमुख थे। इन कलाकारों ने पाश्चात्य कला आंदोलनों की तरह भारत में राष्ट्रीयता के स्वर को हटाकर वैयक्तिक अभिव्यक्ति को प्रमुखता दी। हुसैन और सूजा अपनी कलाकृतियों के चलते विवाद में रहे। फ्रांसिस न्यूटन सूजा ने नग्न कामुक आलिंगन, संभोग को वीभत्सता और अमानवीयता तथा आपराधिक भाव में चित्रित किया। घोड़े की तीव्रता चित्रित करने वाले हुसैन ने ज्ञानदेवी सरस्वती की नग्न आकृति बनायी। यहीं से विवादित होकर प्रसिद्ध होने का नया फार्मूला कला जगत में निकल कर आया। जिसे आगे कई कलाकारों ने अपनाया। 
चिन्तन और विमर्श की बात यह है कि ऐसा बनाया क्यों गया? पूर्व में जब राजा रवि वर्मा सरस्वती की कल्पना को चित्रित करते हैं तो वो जनमानस में पूज्य बन जाती है, जब अवनीन्द्र नाथ भारतमाता बनाते हैं तो करोड़ों भारतवासियों के लिए श्रद्धा बन जाती हैं । उसके बाद वीणावादिनी रेखारुप में नग्न बनायी जाती हैं। कुछ नया यथार्थ स्थापित किया जाता है। इस देश का जनमानस अपनी आस्था प्रतीकों के रूप में सुरक्षित रखता है। ये प्रतीक किसी भी स्वरुप के साथ रख देने पर आदर्श का मूर्तिमान रुप पुनः उपस्थित हो जाता है जैसे रामलीला में राम की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति साल दर साल बदल जाता है लेकिन धनुष, तूणीर और गेरुआ धारण करके अन्य व्यक्ति राम को उपस्थित कर देता है। भारतीय जनमानस उस रुप को पाकर आनंदित हो जाता है। ये कौन सा सत्यान्वेषी यथार्थ है जो प्रतीकों के मर्म को साधने की बजाय केवल वैयक्तिक रुप से मात्र किसी क्षण की आवेशीय कल्पना को त्वरित बना देने को कलाकार की स्वातंत्र्य अभिव्यक्ति मानता है। 
हुसैन ने उस आस्था को केवल महिला और वीणा के रुप में संकुचित दृष्टि से देखा । खजुराहो की कामरत मूर्तियाँ जो अलग ही भाव रचती हैं वहीं सूजा के कामरत मिथुन चित्र आपराधिक-वीभत्स वृत्तिपूर्ण मात्र निजी कड़वाहट ही बताते हैं। तथाकथित प्रगतिशीलता की रफ्तार में भारतीय कलाधारा अपनी स्वातंत्र्य चेतना  में अंतर्निहित संगच्छध्वं संवदध्वं के भाव से नीचे उतरकर कुंठित और  व्यक्तिनिष्ठ हो जाती है। आज भी भौतिक चकाचौंध और करोड़ रुपये में बिकने की लालसा ने कला की स्वतंत्रता के विमर्श को दिशाहीन कर दिया है। समष्टि की अभिव्यक्ति गायब है। राष्ट्रीयता का विषय  कलाकारों के 'कन्टम्पररी' (तथाकथित समकालीनता) होने पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। राष्ट्रीयभाव का स्वाभाविक अंकन करने की बजाय कुछ कलाकार केवल ऐतिहासिक धरोहरों को  चित्रित करके ही  राष्ट्रीय कलाकार का दर्जा पा लेना चाहते हैं। धरोहरों को आत्मसात करके वर्तमान के साथ चिन्तन के फलस्वरुप नवीन प्रयोग किये जायें जैसे अवनीन्द्रनाथ जैसे अनेक शिल्पियों ने किया, तो भारतीय कला जगत में स्वदेशी कला के नये युग का सूत्रपात होगा।
 

Comments

  • By cialis tadalafil
    2021-01-04 11:23:29

    hello guos 9128738513

  • By Tinder dating site
    2021-01-25 08:43:14

    tinder login, how to use tinder tinder website

  • By CharlesDug
    2021-02-01 15:53:26

    tinder date , tinder online tinder website

  • By CharlesDug
    2021-02-15 12:14:03

    browse tinder for free , tider tinder login

  • By Kqaiqw
    2021-05-05 07:27:39

    stromectol uk - ivermecpls stromectol otc

  • By Rhejdq
    2021-05-07 06:44:39

    buy ivermectin canada - ivermectin iv buy ivermectin pills

  • By Ejlcbo
    2021-05-16 07:45:48

    best ed pill cialis viagra levitra - best ed pills on ebay best ed otc pills to take

Write A Comment