लोक संवाद

कोरोना काल में उत्सवधर्मी समाज का लोकसंवाद

भारत के वाचाल समाज ने हमेशा ही दुनिया के तमाम संकटों में एक नई दृष्टि के साथ समाधान की बात कही है। भारत में यह काम हमेशा ही लोकसंवाद के माध्यमों ने किया है। कोरोना के इस संकट में भी भारत के लोक कलाकारों ने आगे बढ़कर संदेश देने का काम किया है। अल्हैतों का आल्हा, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समाज में प्रचलित रागनियां और भोजपुरी लोकगीतों समेत तमाम लोककलाओं से जुड़े कलाकारों ने कोरोना से निपटने के संदेश को पिरोकर जन-जन तक पहुंचाया है। महाकाल में आस्था रखने वाले समाज ने कोरोना के चलते पैनिक में आने की बजाय सावधानी, नियमों के पालन और मुसीबत में फंसे लोगों की मदद का संदेश देने का काम किया।

आल्हा के लोकगायकों ने भी कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए सहज और अर्थपूर्ण शब्दों में समाज को प्रेरित किया है। बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल की वीरता के बखान करने वाले काव्य आल्हखंड की तर्ज पर बने इन गीतों ने जनता को उनकी ही बोली में कोरोना के प्रति जागरूक किया है। ऐसे ही एक गीत में आल्हा की लोकगायिका संजो बघेल कोरोना से बचाव के लिए प्रेरित करते हुए कहती हैं-

लगी है किसकी है मोटी हाय, झेल रही है दुनिया बीमारी,
शहर वुहान से पहुंची आय, लाखों दीन्हें प्राण गंवाय।
सभी लोग संयम अपनाय, हाथों को अच्छे से धोना,
रहें सभी से दूरी बनाय, मुंह पर मास्क बांधकर रखना।
रहना घर संकल्प बनाय, इन बातों का पालन करना,
देंगे हम बीमारी को हराय, लॉकडाउन में घर ही रहना।


कोरोना के इस संकट में भोजपुरी गीतों ने भी अपने सुरीले अंदाज में कोरोना के पैनिक से बचाते हुए लोगों को सहज भाव के साथ घर रहने और नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया। भले ही बीते कुछ सालों में भोजपुरी के साथ भड़कीले गीतों को कुछ गायकों ने चस्पा करने की कोशिश की है, लेकिन इस दौर में पलायन के दर्द, कोरोना के मर्ज और नियमों को मानने के फर्ज को भोजपुरी गीतों ने बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है।

जे घर ही में प्रेम लगाई पिया, ओकर पजरा कोरोना न आई पिया।
घर ही में समय बिताईं, हमार पिया रोड पर न जाईं...
कोरोना पर भइल बा कड़ाई, हमार पिया बाहरा न जाईं,
बचब आप अउर परिवार बच जाई, कुछ जिम्मेदारी लीहै का चाही।
बार-बार हाथ सबुनियाईं, हमार पिया रोड पर न जाईं....
पुलिस घूम-घूम बात समझावै, डॉक्टर एहि के दवाई समझावै,
कोरोना पर भइल बा कड़ाई हमार पिया रोड पर न जाईं।


भोजपुरी के लोकप्रिय कलाकार भरत शर्मा ने अपने सुरीले अंदाज में इस गीत को पेश किया है। ऐसा ही एक गीत भोजपुरी गीत है, गइले कमाए उ तो दिल्ली ए सखी, लॉकडाउन में सइयां फंस गइले। इस गीत में लेखक ने एक साथ कोरोना के संकट, प्रेम और लॉकडाउन के नियमों को पिरोने का काम किया है। एक ऐसे दौर में जब हम अपनी लोकभा और लोककलाओं से दूर होते जा रहे हैं, तब इस तरह के गीतों ने यूट्यूब से लेकर फेसबुक तक न्यू मीडिया के तमाम माध्यमों में ख्याति हासिल की है। हरियाणवी के लोकगायक शैन्की गोस्वामी ने भी रैप की नई विधा के अंदाज में कोरोना के लॉकडाउन को लेकर बेहद रोचक गीत प्रस्तुत किया है। भारत की उत्सवधर्मिता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने इस गीत को जिस शैली में पेश किया है, उससे न सिर्फ कोरोना को लेकर संदेश मिलता है बल्कि समाज का सात्विक मनोरंजन भी होता है। प्रेमी और प्रेयसी के बीच संवाद को कोरोना और लॉकडाउन से जोड़ते हुए उन्होंने बेहद ही सहज ढंग से रोचक गीत प्रस्तुत किया है। जिसके बोल इस प्रकार हैं-

लॉकडाउन होया मेरा गाम सुण लै,
लगता न गेड़ा लाडो तेरे शहर का।
बात मेरी मान रखियो तू भी ध्यान,
घर आगे गेड़ा लागे पीसीआर का।
पड़ी है मुसीबत जो टल जावैगी,
राखना पड़ेगा लाडो ध्यान खुद का।
हाथ नहीं मिलाना, मेंटेन रखो गैप,
वर्ल्ड वार होया तीसरा मैदान युद्ध का।


शैन्की गोस्वामी के इस गीत को यूट्यूब पर अब तक करीब 2.5 करोड़ लोग सुन चुके हैं। भले ही किसी कला को मापने के लिए व्यूअरशिप ही एकमात्र पैमाना नहीं हो सकती, लेकिन आंकड़ों के इस दौर में महामारी पर बने गीत को इतनी लोकप्रियता मिलना मायने जरूर रखता है। स्थान की सीमा को देखते हुए तमाम ऐसे हर प्रयास का उल्लेख यहां नहीं किया जा सकता, लेकिन कोरोना के संकट में लोकसंवाद के माध्यमों ने एक बार फिर साबित किया है कि कोई भी संदेश व्यक्ति अपनी मौलिक भाषा में ही सहजता के साथ समझ पाता है। भाषाविज्ञानियों ने भी अपने तमाम अध्ययनों में कहा है कि लोकभाषाओं में संवाद तमाम विवादों के हल का कारण बन सकता है। कोरोना काल में भी हमें यह देखने को मिलता है कि जो काम अंग्रेजी अखबारों के लंबे अग्रलेख, टीवी चैनलों की अंतहीन उबाऊ बहसें नहीं कर पाई, उसे सहजता के साथ लोक गीतों ने किया है।

कोरोना जैसी महामारी के चलते जहां एक तरफ दुनिया खौफ के साये में जी रही है, वहां भारत में इस पर गीतों का सृजन होना बताता है कि भारत का उत्सवधर्मी समाज किस तरह से संकटों में भी अपनी राह बनाता है। यह सब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह काम उस समाज ने जीवटता के साथ किया है, जिसका वैश्विक मीडिया ने हमेशा गरीबों के आंकड़े के तौर पर ही चित्रण किया है। उस समाज ने यह साबित किया है कि वह किस तरह सहजता से कड़े नियमों का पालन कर सकता है और संसाधनों की परवाह न कर हौसले के साथ कोरोना जैसे अदृश्य दुश्मन के मुकाबिल भी खड़ा रह सकता है।

 

भारत के समाज में लिखित इतिहास का प्रभाव भले ही बड़ा अकादमिक महत्व रखता है, लेकिन आम लोगों के जीवन की बात करें तो अब भी भारतीय समाज मौखिक तौर पर हासिल परंपराओं का पालन कर रहा है। कोरोना के इस संकट में भारत के लोक ने साबित किया है कि संवाद के असल मायने आज भी उनके लिए बहुत बदले नहीं हैं।

लोकजीवन पर पंडित लखमीचंद की रागनियों और सांग का प्रभाव

लोककलाओं की यह विशेषता होती है कि वे आम समाज से उसके ही शब्दों, ठेठ भावों और आसपास के उदाहरणों के जरिए ही संवाद करती हैं। ‘कोस कोस पर पानी बदले और चार कोस पर वाणी’ की कहावत वाले भारत में लोककलाएं भी खासी विविधता लिए हुए हैं। लेकिन, यह अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में आम समाज का मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि जीवन के कठिन पहलुओं को सहज शब्दों में पिरोकर सीख भी देती हैं। ऐसी ही लोककला हरियाणा की सांग और रागनी भी है।
रागनी और सांग के सबसे बड़े कलाकार और गायक पंडित लखमीचंद माने जाते हैं। उन्हें हरियाणवी संगीत और सांग का सूर्यकवि कहा जाता है। हरियाणा के शेक्सपियर की उपाधि भी उन्हें दी जाती है। हरियाणवी साहित्य में योगदान देने वाले कलाकारों को प्रत्येक वर्ष हरियाणा कला अकदमी की ओर से पंडित लखमीचंद अवॉर्ड दिया जाता है। 1903 में जन्मे लखमीचंद महज 42 साल की आयु में ही दुनिया छोड़ गए, लेकिन आज भी उनके द्वारा रचित सांग और रागनी हरियाणा ही नहीं बल्कि राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश तक में लोकप्रिय हैं। उनकी रागनियां मनोरंजन का सरस माध्यम तो हैं ही बल्कि उनके जाने के करीब 85 साल बाद भी लोगों को नीति और धर्म का ज्ञान देती हैं।
उन्होंने भारत के मौलिक ज्ञान के स्रोत कहे जाने वाले पौराणिक किस्सों और कहानियों को सांग और रागनी के माध्यम से जन-जन तक हरियाणवी भाषा में पहुंचाया। हरियाणा के सोनीपत जिले के जट्टी कलां गांव में जन्मे पंडित लखमी चंद के पिता साधारण किसान थे। वह भी बहुत नहीं पढ़ सके, लेकिन उनकी चेतना का विस्तार कबीर सरीखा था। उनके कहे में ग्रामीण परिवेश के शब्द और भाव थे। यही कारण था कि उनकी रागनियां और सांग आज भी जन-जन के कंठ में बसी हैं। हरियाणवी का शायद ही कोई ऐसा लोकगायक होगा, जिसने लखमनीचंद की रागनियां न गाई हों।

पौराणिक किस्सों से दिया समाज को ज्ञान

भारतीय ज्ञान परंपरा में वेद, पुराण और किस्सों की अहम भूमिका रही है। पंडित लखमीचंद ने इनके जरिए ही आम जन को जीवन के कठिन पहलुओं को सहज शब्दों और भावों के जरिए पहुंचाया। उनकी रचनाओं का प्रकाशन लखमीचंद का ब्रह्मज्ञान खंड 1 और खंड 2 के तौर पर प्रकाशित हुआ है। पंडित लखमीचंद की रागनी का एक लिंक भी यहां पेश है, जिस पर क्लिक करके आप पूरी रागनी सुन सकते हैं।

प्रेम, सत्य और त्याग की कहानियां सुनाती रागनियां

हरियाणा के कलाकार प्रेम से उन्हें दादा लखमीचंद कहते हैं। लखमीचंद ने त्याग के पर्याय कहे जाने वाले राजा हरीशचंद्र पर रागनियों को किस्से के तौर पर पिरोया है और उन पर रागनियों की रचना की और गाया। इसके अलावा उन्होंने भारत में वर्णित नल-दमयंती के किस्से को भी रागनी के जरिए जन-जन तक पहुंचाया। यही नहीं भारतीय पौराणिक साहित्य में अहम स्थान रखने वाले सत्यवान और सावित्री की प्रेम कहानी को भी उन्होंने अपने ढंग से प्रस्तुत किया। इसके अलावा हीर रांझा के किस्से को भी उन्होंने हरियाणवी में रागनी के तौर पर पेश किया।

लोकभाषा में संवाद करते थे लखमीचंद

पंडित लखमीचंद की रागनियां और सांग खासे संवादपरक हैं। आम लोगों तक इन्होंने जो छाप छोड़ी है, वह वास्तव में शोध का विषय है। किस प्रकार एक लोक कला जन-जन के कंठ में बस जाती है, इसका लखमीचंद की रचनाएं अप्रतिम उदाहरण हैं। उनकी संवादपरकता, हरियाणवी भाषा क्षेत्र में उनके प्रभाव और समाज में उनकी गहरी पहुंच निश्चित तौर पर शोध का विषय हैं। अब तक उन पर व्यवस्थित ढंग से शोध नहीं हुआ हैं। इसके अलावा उनकी यदि उनके संबंध में व्यवस्थित ढंग से कुछ लिखा जाए तो निश्चित तौर पर उनको लेकर लोगों को जानकारियां मिल सकेंगी। इसके अलावा रागनी और सांग जैसी लोककला की प्रतिष्ठा भी बढ़ सकेगी।

लोकसंवाद में महाराणा प्रताप

हल्दी घाटी में समर लड्यो, वो चेतक रो असवार कठे... हिंदवा सूरज मेवाड़ रतन, वो महाराणा प्रताप कठे...। कभी आक्रांता मुगलों को भी लोहे के चने चबवाने वाले और भारत की प्रतिरोध की संस्कृति के प्रतीक महाराणा प्रताप को लोकसंवाद की परंपरा में कुछ यूं याद किया जाता है। विश्वविद्यालयों में इतिहास की पुस्तकों में हम जिन महाराणा के बारे में जानते हैं, उनका विस्तार लोक परंपरा में उससे कहीं अधिक है। राजस्थान और देश के असंख्य लोगों के मन में आज भी अन्याय के खिलाफ वह एक नायक के तौर पर स्थापित है। महाराणा प्रताप का अकबर से कब युद्ध हुआ, कौन जीता, किसका कितना नुकसान हुआ और उसके बाद क्या परिणाम हुए, यह इतिहासकारों के शोध के विषय हमेशा बने रह सकते हैं। लेकिन, भारतीय जनमानस के लिए महाराणा प्रताप इतिहास के किसी शासक या योद्धा की भूमिका से परे हैं।

बीते 400 सालों के इतिहास में महाराणा प्रताप की लोककथाएं एक से दूसरी और दूसरी से तीसरी पीढ़ी और फिर आगे तक रिसते हुए यहां तक पहुंची हैं। भले ही उनके संबंध में तमाम इतिहासकारों ने संक्षिप्त भूमिका ही लिखी हो, लेकिन लोककंठ में उनका विस्तार अथाह है। वो नीले घोड़े रा असवार, म्हारा मेवाड़ी सरदार... लिखित इतिहास से परे हैं। महाराणा प्रताप के जीवन का हम अध्ययन करते हैं तो हम यह पाते हैं कि वह संसाधनों के बिना भी जीवट के साथ लड़ते रहे। परतंत्र नहीं होना है, भले ही उसकी कीमत घास की रोटियां खाना हो। महाराणा प्रताप की यह सीख भारत के स्वाभिमान का प्रतीक है। महाराणा प्रताप की कथाएं हमें यह भी बताती हैं कि भारत किस तरह से लोकसंवाद के जरिए अपने पूर्वजों का स्मरण करता रहा है। भले ही उनके बारे में हमें इतिहास कर अपने हिस्से का ही सच बताते हैं, लेकिन लोककथाएं हमें उन अनछुए पहलुओं से अवगत कराती हैं, जो महाराणा प्रताप होने के मायने बताते हैं।

भारत हमेशा से वाचाल समाज रहा है और यही कारण है कि हम पीढ़ियों तक किसी भी चीज को बिना लिखे ही पहुंचा सके हैं। इसका कारण लोकसंवाद की वह परंपरा ही है, जो हमें पूर्वजों से विरासत में मिली है। महाराणा प्रताप ऐसे नायक हैं, जिन पर कोई ग्रंथ नहीं लिखा गया। उनका कोई दरबारी कवि नहीं था, जो उनकी वीरता की गाथाओं का दस्तावेजीकरण करे। फिर भी हमें महाराणा की वीरता से लेकर उनके अश्व चेतक की चपलता तक का वर्णन कविताओं, रागनियों, गीतों और किस्सों में मिलता है। भले ही महाराणा का केंद्र मेवाड़ और राजस्थान रहा हो, लेकिन लोकसंवाद की इस परंपरा के चलते ही वह पूरे भारत में आंक्राताओं के खिलाफ एक नायक, एक प्रतीक के तौर पर जाने गए।

कवि माधव दरक ने महाराणा के स्मरण में सुंदर कविता लिखी है। वह लिखते हैं-

ये माटी हल्दीघाटी री लागे केसर और चंदन है,

माथा पर तिलक करो इण रो इण माटी ने निज वंदन है...

या रणभूमि तीरथ भूमि, दर्शन करवा मन ललचावे,

उण वीर-सुरमा री यादा हिवड़ा में जोश जगा जावे...

उण स्वामी भक्त चेतक री टापा, टप-टप री आवाज कठे,

हल्दी घाटी में समर लड्यो, वो चेतक रो असवार कठे...।

महाराणा प्रताप के घोड़े 'चेतक' पर लिखी गई कविता भी हम सभी ने पढ़ी है। कवि श्यामनारायण पांडेय ने 20वीं सदी में इस कविता को रचा था, लेकिन उसकी प्रेरणा पीढ़ियों से लोककंठ में रची-बसी राणा की अनसुनी कहानियां ही थीं। जो चेतक पर सुंदर रचना के माध्यम से प्रस्फुटित हुईं। महाराणा प्रताप का यह नायकत्व लोकसंवाद की इस परंपरा के चलते और निखरे हुए स्वरूप में हम सभी के समक्ष आया है। महाराणा प्रताप की जयंती के इस अवसर पर अपने नायक का स्मरण करने के साथ ही हमें लोकसंवाद की उस शैली और परंपरा को भी बनाए रखने के क्या यत्न हो सकते हैं, उस पर विचार करना चाहिए। महाराणा प्रताप जैसे हमारी पीढ़ी तक आए हैं, वैसे ही भावी पीढ़ियां भी उन्हें समझ सकें, उनके व्यक्तित्व में झांक सकें, इसके लिए हमें लोकसंवाद का वह झरोखा खुला रखना होगा, जो हमारे पूर्वजों ने तैयार किया था।

जनसंचार से पहले था आल्हा का लोकसंचार

मीडिया की परिभाषा उसके तीन कामों का जिक्र करती है, सूचना, शिक्षण एवं मनोरंजन। भले ही इस दौर के मीडिया की पैकेजिंग में सूचना और शिक्षण के तत्व कम हुए हैं और मनोरंजन का मसाला ज्यादा है। लेकिन भारत की लोककलाएं जनसंचार का वह पक्ष हैं, जो आम लोगों का उनकी बोली में मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि सूचित और शिक्षित भी करती हैं। भारत में संवाद और संचार की परंपरा मानव सभ्यता के विकास के साथ चलती रही है। धार्मिक ग्रंथ, प्राचीन साहित्य से लेकर देश के कोने-कोने की लोककलाएं संवाद का सशक्त माध्यम रही हैं। ऐसा ही एक लोक काव्य है, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र का आल्हखंड, जिसे जनसामान्य में आल्हा के नाम से जाना जाता है और इसके गवैये अल्हैत कहलाते हैं।
जनसंचार के माध्यम भले ही आज रेडियो, टीवी, अखबार, इंटरनेट और तमाम तकनीकें हों, लेकिन जब ये न थीं, जब गूगल बाबा न थे तो निश्चित तौर पर ऐसी लोक परंपराएं ही आम जन के लिए ज्ञान का स्रोत थीं। आल्हा काव्य एक तरफ भारतीय लोक का रसपूर्ण मनोरंजन करता है तो दूसरी तरफ जीवन के कठिन पहलुओं को लेकर सहजता से शिक्षित भी करता है। राजा का दायित्व जनता के प्रति क्या हो, सेना किस प्रकार एकजुट हो, पारिवारिक संबंधों की गरिमा क्या रहे और समाज के प्रति सरोकर क्या हों, जीवन के ऐसे तमाम पक्षों पर आल्हखंड सुरुचिपूर्ण शिक्षण देता है।
आल्हा का कोई एक विधिवत ग्रंथ नहीं है, जैसा रामचरितमानस के साथ है। इसके बावजूद एक बड़े हिंदी क्षेत्र में इसकी लोकप्रियता को रामचरितमानस के बाद दूसरे स्थान पर रखा जा सकता है। जगनिक द्वारा रचित 'आल्हखंड' अप्राप्य है। फिर भी लोककंठ में सैकड़ों वर्षों तक यह ऐसा बसा रहा कि 1865 में फर्रुखाबाद के कलेक्टर रहे अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स इलियट ने इसका संकलन कराया। इसके बाद भी कई छिटपुट प्रयास हुए हैं, लेकिन अर्थ सहित पूरा 'आल्हखंड' प्रकाशित नहीं हो सका है। यह अवधी-बुंदेली मिश्रित शैली में है और सिर्फ काव्य रूप में ही है।

1,000 साल से लोककंठ में मौजूद

आल्हा का भले ही कोई निश्चित ग्रंथ या भाषा टीका नहीं है, लेकिन लोगों के जेहन में यह इतना गहरे उतरा है कि पीढ़ियों रिसते हुए 1,000 साल का सफर तय कर चुका है। बुंदेली, अवधी, भोजपुरी, रुहेली, ब्रज, बघेली, कौरवी और मैथिली समेत लगभग पूरी हिंदी पट्टी में वीर रस के इस अनुपम काव्य की गहरी मान्यता है। हर बोली के अल्हैत यानी आल्हा गाने वाले अपनी शैली में ढाल कर वीररस से लोगों को सराबोर करते हैं। आल्हा के पाठ को पंवाड़ा कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार में इसका लोकजीवन पर ऐसा प्रभाव है कि तमाम लोकोक्तियां और कहावतें लोगों को आल्हा से मिलती हैं।

आल्हा सुन विश्व युद्ध में लड़ने गए थे सैनिक

हिंदी क्षेत्र के लोकमानस में आल्हा कितने गहरे उतरा है और इसका संचार पक्ष कितना सशक्त है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1914-18 और 1939-45 के पहले और दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने सैनिकों में उत्साह भरने के लिए छावनियों में इसके कार्यक्रम आयोजित कराए। यही नहीं लंबे समय तक पुलिस की पासिंग आउट परेड में भी जवानों में वीरता और कर्तव्यपरायणता के लिए आल्हा सुनाया जाता रहा।

अंग्रेजों ने कराया कई खंडों का अनुवाद

भले ही आल्हा हिंदी क्षेत्र की अमूल्य धरोहर है, लेकिन विदेशी विद्वानों ने स्वदेशी लेखकों से पहले ही इस पर काम शुरू कर दिया था। हिंदी के प्रसिद्ध ब्रिटिश मूल के इतिहास लेखक ग्रियर्सन ने आल्हा की लोकप्रियता को देखते हुए इसके कई खंडों का अंग्रेजी में अनुवाद कराया था। इनमें 'मारू फ्यूड' यानी 'माड़ो की लड़ाई' और 'नाइन लैख चेन' यानी 'नौलखा हार की लड़ाई' जैसे खंड विशेषतौर पर उल्लेखनीय हैं। यही नहीं अमेरिकी रिसर्चर डॉ. केरिन शोमर ने तो आल्हा की यशोगाथा की तुलना में यूरोप में ओजस्वी कवि होमर द्वारा रचित इलियड और ओडिसी के समकक्ष स्थान दिया है। ग्रियर्सन द्वारा 'ब्रह्म का विवाह' खंड का अंग्रेजी अनुवाद 'द ले ऑफ ब्रह्मज मैरिज: एन एपिसोड ऑफ द आल्हखंड' आज भी उपलब्ध है। ग्रियर्सन ने इसकी भूमिका में लिखा है कि पटना से लेकर दिल्ली तक आल्हा से अधिक कोई भी कहानी जनमानस में लोकप्रिय नहीं है।

गांवों की चौपारों से निकल यूट्यूब तक पहुंचा आल्हा

आल्हा मूल रूप से बुंदेलखंड की धरोहर है, लेकिन हिंदी पट्टी के हर क्षेत्र ने इसे अपनी शैली में ही इस तरह से अपना लिया है कि यह लोकजीवन का अंग बन गया है। आम मान्यता है कि गंगा दशहरा से लेकर दशहरे तक यानी बरसात के मौसम में इसका गायन किया जाता है। इसके लिए कहा भी जाता है कि-

'भरी दुपहरी सरवन गाइय, सोरठ गाइये आधी रात।
आल्हा पंवाड़ा वा दिन गाइय, जा दिन झड़ी लगे बरसात।'

गायन की एक नई शैली बना आल्हा

बदले सामाजिक जीवन में लोगों की बढ़ती व्यस्तता और ग्रामीण जीवन पर असर के चलते गांवों की चौपारों में अब इनका आयोजन इक्के-दुक्के ही होता है, लेकिन तकनीक के युग में यह मोबाइल और यूट्यूब तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। संगीत के क्षेत्र में भी आल्हा की शैली का इन दिनों जमकर इस्तेमाल हो रहा है। कई भजनों से लेकर फिल्म 'मंगल पांडे' के गीत 'मंगल-मंगल' में भी इसकी शैली का इस्तेमाल किया गया है।

जीवन के गूढ़ रहस्यों को सरल शब्दों में समझाते हैं अल्हैत

आल्हा की शैली और शब्दों की यह विशेषता है कि इसे आम लोग भी बेहद आसानी से समझ लेते हैं और रस लेते हैं। यही नहीं बेहद सरल शैली में आल्हा गाने वाले यानी अल्हैत पंवाड़े के बीच में ही जीवन के कई गूढ़ पहलुओं को सरल शब्दों में सामने रखते हैं। जैसे-

'राम बनइहैं तो बन जइहैं, बिगरी बात बनत बन जाय।'

यह पंक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति में ईश्वर पर भरोसा बनाए रखने की सीख देती है।

कर्तव्य पर डटे रहने का संदेश देते हुए अल्हैत कहता है-

'पांव पिछारे हम न धरिहैं, चाहे प्राण रहैं कि जायें।'

पुत्र के समर्थ होने से माता-पिता को किस प्रकार सहारा मिलता है। इस पर आल्हा की यह एक पंक्ति सार्थकता से अपनी बात कहती है-

'जिनके लड़िका समरथ हुइगे, उनका कौन पड़ी परवाह'

स्वामी तथा मित्र के लिए कुर्बानी दे देना सहज मानवीय गुण बताए गए हैं-

'जहां पसीना गिरै तुम्हारा, तंह दै देऊं रक्त की धार'

अपने बैरी से बदला लेना सबसे अहम बात माना गया है-

'जिनके बैरी सम्मुख बैठे उनके जीवन को धिक्कार।'

सामाजिक समरसता का संदेश देते अल्हैत

आल्हा और ऊदल का स्तुतिगान भले ही योद्धा के तौर पर किया गया है, लेकिन जातियों से परे समूचे समाज के लिए आल्हा का नायक होना शायद इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि वे शिवाजी सरीखे समावेशी सेनापति थे। जैसे महाराष्ट्र समेत देश भर में हिंदवी साम्राज्य की स्थापना के चलते जननायक बने शिवाजी के राज्य और सेना में सभी वर्गों को महत्व था, वैसी ही नीति महाबलि आल्हा की भी थी। 'आल्ह खंड' के मुताबिक, उनकी सेना में लला तमोली, धनुवा तेली, रूपन बारी, चंदर बढ़ई, हल्ला, देबा पेडित जैसे लोग सेना के मार्गदर्शक थे। आल्हखंड की पंक्तियां इसका प्रमाण हैं, जो सामाजिक समरसता का संदेश देती हैं-

'मदन गड़रिया धन्ना गूलर आगे बढ़े वीर सुलखान,
रूपन बारी खुनखुन तेली इनके आगे बचे न प्रान।
लला तमोली धनुवां तेली रन में कबहुं न मानी हार,
भगे सिपाही गढ़ माड़ौ के अपनी छोड़-छोड़ तलवार।।'


बुंदेली कवि जगनिक ने 'आल्ह खंड' की रचना कर भारतीय समाज को उस दौर में वीरता की गाथा सुनाई, जब देश चहुंओर विदेशी आक्रमण झेल रहा था। जगनिक की इस काव्य रचना का यही असर था कि विश्व युद्ध की छावनियों से निकल समर में उतरने के लिए इसने सैनिकों का हौसला बढ़ाया। आज भी यह काव्य वीरता, जीवटता, सामाजिक समरसता और मानवीय गुणों का संदेश देता है। भारत के वाचाल समाज में लोककलाओं के महत्व को आल्ह खंड के अध्ययन से बखूबी समझा जा सकता है।