समाज संवाद

सही सूचनाओं का आरोग्य सेतु

कोरोना संकट के समय आरोग्य सेतु ऐप ने शासन-प्रशासन से लेकर आमजन के मध्य संवाद के महत्वपूर्ण सेतु खड़े किए हैं। इसी ऐप के जरिए सरकार को सही समय पर करीब साढ़े छह सौ हॉट-स्पॉट्स की सटीक जानकारी मिली। समय रहते संभावित संकट की सटीक सूचना पाकर सरकार ने आवश्यक कदम उठा लिए और उसी का नतीजा है कि भारत ने कोरोना को अपने यहां अब तक बे-लगाम नहीं होने दिया। भारत अब भी अमेरिका, इटली, स्पेन, चीन, ब्रिटेन, रूस और ब्राजील जैसे संसाधन संपन्न देशों की अपेक्षा कोरोना के खिलाफ ज्यादा कारगर ढंग से लड़ाई लड़ पाया है। इस प्रकार सही समय पर सरकार और लोगों में आवश्यक सूचनाएं पहुंचाकर आरोग्य सेतु ऐप ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत सरकार ने कोरोना संक्रमितों को ट्रैक करने के लिए अप्रैल की शुरुआत में आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप को लॉन्च किया था। लॉन्च होने के कुछ ही दिन में इस ऐप ने सबसे ज्यादा डाउनलोड होने का मुकाम हासिल किया था। 12 मई तक इस ऐप को 10 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता डाउनलोड कर चुके थे। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने दावा किया है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव संबंधी जानकारी देने के लिए सरकार द्वारा जारी आरोग्य सेतु ऐप दुनिया में सबसे अधिक डाउनलोड होने वाला स्वास्थ्य सेवा ऐप बन गया है। इसकी लोकप्रियता और कार्यप्रणाली से प्रभावित होकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी जल्द ही आरोग्य सेतु जैसा ऐप लॉन्च करने की बात कही थी, जिसमें वो सारी तकनीकी खासियतें होंगी, जो आरोग्य सेतु में हैं। भारत के अलावा फिलहाल ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम अपना खुद का वायरस को ट्रेक करने वाला ऐप लॉन्च कर चुके हैं।

इस तरह भारत सरकार ने कोरोना के खिलाफ अपनी अब तक की लड़ाई में जो सबसे कारगर कदम उठाए हैं, उनमें आरोग्य सेतु ऐप भी शामिल है। इस ऐप के प्रति लोगों में अविश्वास की भावना पैदा न हो, इसके लिए केंद्रीय संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आरोग्य सेतु ऐप को निजी ऑपरेटर को आउटसोर्स किए जाने को खारिज करते हुए कहा कि इसमें डाटा सुरक्षा की ठोस व्यवस्था है। केंद्रीय मंत्री ने अपने ट्वीट में कहा कि इस ऐप की दुनिया भर में सराहना की जा रही है जिसे सरकार ने कोरोना वायरस से लड़ाई में एक महत्वपूर्ण हथियार बताया है।

समस्या ही नहीं समाधान की बात भी करे मीडियाः के.जी. सुरेश

वरिष्ठ पत्रकार एवं भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली, के पूर्व महानिदेशक प्रो. के.जी. सुरेश ने कहा कि अब पत्रकारिता सिर्फ समस्या ही नहीं, बल्कि समाधान की भी बात करे। दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (डीजेए) और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के संयुक्त तत्वावधान में 27 मई, 2020 को अहिंसात्मक संवाद पर आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि मीडिया में सिर्फ नकारात्मक दृष्टि पर ही ध्यान केन्द्रित रहेगा तो वह समाज में रचनात्मक उर्जा का संचार नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि समाधान-परक पत्रकारिता को पाठ्य पुस्तकों में शामिल किया जाए और विशेषज्ञों से बात करके इसका पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए।

 

वेबिनार में उपस्थित दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन और नेशनल यूनियन ऑफ (इंडिया) के पदाधिकारियों ने देशभर में अहिंसात्मक संवाद आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। वेबिनार में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के कार्यक्रम अधिकारी डा. वेदाभ्यास कुंडु, नेशनल यूनियन ऑफ (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज मिश्र, कोषाध्यक्ष व आकाशवाणी नई दिल्ली में सलाहकार श्री उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं बहुचर्चित पुस्तक ‘द फ्यूचर न्यूजरूम’ व ‘आधुनिक भारत के गुमनाम समाज-शिल्पी’ सहित करीब एक दर्जन पुस्तकों के लेखक डा. प्रमोद कुमार, दिल्ली  जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एव पीटीआई-भाषा के वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोहर सिंह, डीजेए के महासचिव तथा ‘जनसत्ता’ के वरिष्ठ पत्रकार श्री अमलेश राजू सहित दिल्ली, चंडीगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित देश के अनेक हिस्सों से 100 से अधिक लोगों ने वेबिनार से जुड़कर अहिंसात्मक संवाद को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। वेबिनार का संचालन डीजेए अध्यक्ष श्री मनोहर सिंह ने किया।

 

प्रो. के.जी. सुरेश ने भारतीय जनसंचार की अवधारणा परविस्तार से प्रकाश डाला और बताया कि वेद और उपनिषद काल में संचारकिस प्रकार होता था। उन्होंने कहा कि जनसंचार की भारतीय अवधारणा कभी भी नकारात्मक नहीं रही है , बल्कि इसने रचनात्मक भूमिका निभायी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज हमें बुद्ध, विवेकानन्द और महात्मा गांधी सहित भारतीय महापुरूषों के संचार मॉडल को अपनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मीडिया की भूमिका सिर्फ सूचना प्रदान करना नहीं, बल्कि लोगों को सुशिक्षित करना भी है।

 

चर्चा की शुरूआत करते हुए डा. वेदाभ्यास कुंडु ने अहिंसात्मक संवाद के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला और महात्माबुद्ध के सह-अस्तित्व तथा करूणा के सिद्धांतों की चर्चा की। महात्मा गांधी को अहिंसात्मक संवाद का सबसे बड़ा प्रस्तोता बताते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीजी ने अंग्रेजों के साथ संवाद के सभी मार्ग सदैव खुले रखे। उन्होंने कहा कि गांधी जी के अहिंसात्मक संवाद को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।

 

श्री मनोज मिश्र ने चंपारण में महात्मा गांधी द्वारा अहिंसात्मक ढंग से किये गये आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि किसानों और अंग्रेज अधिकारियों से बात करते हुए उन्होंने कभी भी हिंसा का सहारा नहीं लिया और न ही कभी लोगों को कानून हाथ में लेने के लिए उकसाया। उन्होंने कहा कि मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वह मामले को भड़का भी सकती है और तनाव को समाप्त भी कर सकती है।

 

विभिन्न टेलीविजन समाचार चैनलों में प्रसारित समाचारों में जारी ‘तमाशा संस्कृति’ का जिक्र करते हुए  श्री उमेश चतुर्वेदी ने कहा कि इस समय कोविड-19 संकट के दौरान प्रवासी मजदूरों की समस्या का शांतिपूर्वक ढंग से समाधान निकल सकता था, परन्तु टेलीविजन मीडिया ने अफवाहों को फैलने में मदद की और लोगों को सही जानकारी न देकर भ्रम को और बढ़ाया।

 

सुप्रसिद्ध लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार डा. प्रमोद कुमार ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए विस्तार से बताया कि दोनों ही महापुरूष मीडिया की रचनात्मक भूमिका को लेकरकितने सजग थे और उन्होंने किस प्रकार मीडिया के माध्यम से समाज के रचनात्मक पक्ष को उजागर करने में सक्रिय भूमिका निभायी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जिक्र करते हुए उन्होंने मीडिया में भाषा की मर्यादा का ध्यान रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि समाज के रचनात्मक पक्ष को उजागर करने, अंहिंसात्मक संवाद को बढ़ावा देने और मीडिया में भाषा की मर्यादा जैसे विषयों को मीडिया पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए ताकि भावी पत्रकार प्रारंभ से ही इन गुणों से युक्त होकर मीडिया में प्रवेश करें।

 

चर्चा में मधेपुरा बिहार से गांधी ज्ञान मंदिर के वरिष्ठ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता श्री दीना नाथ प्रबोध सहित नेशनल यूनियन ऑफ (इंडिया) के महासचिव श्री सुरेश शर्मा, एनयूजे स्कूल के अध्यक्ष श्री अशोक मलिक सहित अनेक पत्रकारों ने भाग लिया।

 

सोशल मीडिया पर राजनीतिक फैक्ट चेक

एक रोड शो के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को एक व्यक्ति थप्पड़ मार देता है। उनकी पार्टी इसे विरोधी दलों का षड्यंत्र बताती है और थप्पड़ मारने वाले व्यक्ति को दूसरे दल का कार्यकर्ता घोषित कर देती है। मामला आगे बढ़ता इससे पहले ही सोशल मीडिया पर उस व्यक्ति की छान-बीन शुरू हो जाती है और जो सच हाथ लगता है कि उससे एक प्रोपेगैंडा फैलने से पहले ही ध्वस्त हो जाता है। थोड़ी सी छानबीन के बाद यह पता चल जाता है कि वह व्यक्ति ‘आप’ से ही जुड़ा हुआ है और उसके कार्यक्रमों में शिरकत करता रहा है। सोशल मीडिया के ‘फैक्ट-चेक’ के कारण राजनीति को अपना रास्ता सुधारने का यह एक उदाहरण है।
इसी तरह, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ महागठबंधन ने बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेजबहादुर यादव को उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर बहुतों को आश्चर्य में डाल दिया। यह तर्क गढ़ने की कोशिश की गई कि सरकार सैन्य बलों की वास्तविक मांगों को अनसुना कर देती है और जो सही मुद्दे उठाता है, उसके खिलाफ तानाशाही रवैया और असहिष्णुतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाती है। तेजबहादुर यादव के जरिए राष्ट्रवाद, असहिष्णुता और अधिनायकवाद के त्रिकोण में प्रधानमंत्री को घेरने की योजना थी।
विपक्ष का एजेंडा आगे बढ़ता इससे पहले ही सोशल मीडिया के ‘फैक्ट-चेक’ ने उसकी हवा निकाल दी। पहले यह खबर आई कि तेजबहादुर यादव की फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी हैं। रही-सही कसर उस वायरल वीडियो ने पूरी कर दी जिसमे तेजबहादुर यादव 50 करोड़ रूपए के एवज में प्रधानमंत्री की हत्या करवाने की बात कर रहे होते हैं। हिजबुल आतंकियों के साथ अपने संबंध होने की धौंस जमा रहा है, इसके आगे की कहानी बताने की जरूरत नहीं है।
इसी तरह चुनाव के दौरान ही प्रधानमंत्री की एक वीडियो क्लिप वायरल करने की कोशिश की गई, जिसमें वह यह कहते हुए सुनाई पड़ रहे हैं कि ‘मैं पठान का बच्चा हूं’। उन्होंने यह बात इमरान खान को उद्धृत करते हुए कही थी। लेकिन वीडियो सुनने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे प्रधानमंत्री स्वयं को ही, पठान का बच्चा कह रहे हैं। इस वीडियो की भी पोल खुलते देर नही लगी।
ये कुछ उदाहरण भर है, जो यह दर्शाते हैं कि चुनावी मौसम में सोशल मीडिया के कारण किस कदर राजनीतिक प्रोपेगैंडा पर रोक लगी है और उसे और राजनीतिक-प्रक्रिया को ट्रैक पर रखने की मदद मिली है। अभी तक सोशल मीडिया की प्रायः इसी संदर्भ मे चर्चा होती रही है कि यह झूठ को फैलाने का साधन बन गया है। सोशल मीडिया पर जिसके मन में जो आता है, वही लिख देता है और लोग बिना सच की पड़ताल किए पोस्ट्स को लाइक-शेयर करते रहते हैं।
कुल-मिलाकर सोशल मीडिया को झूठ का मंच साबित करने की पुरजोर कोशिश होती है, लेकिन इसी बीच चुनावी मौसम के दौरान सोशल मीडिया के फैक्ट चेक वाले रूप ने यह साबित कर दिया कि सोशल-मीडिया प्रोपेगैंडा-पॉलिटिक्स को लगभग नामुमकिन बना दिया है। झूठ की राजनीति न तो अब राजनेताओं के लिए संभव रह गई है और न ही पत्रकारों के लिए। चंद मिनटों में ही झूठ की राजनीति और झूठ की पत्रकारिता का किला सोशल मीडिया पर सक्रिय जंगजू फतह कर लेते हैं।
कारण यह है कि सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को जुबान दे दी है। अब एक सामान्य सा आदमी भी बड़े से बड़े राजनेता अथवा पत्रकार द्वारा चलाए गए ‘विमर्श’ में न केवल हस्तक्षेप कर सकता है, बल्कि झूठ-सच की तरफ उसका ध्यान भी आकृष्ट करा सकता है। सच के लिए शाबाशी दे सकता है। झूठ के लिए झिड़की लगा सकता है।
आम आदमी को सोशल मीडिया ‘अभिव्यक्ति का नया आकाश’ दिया है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पिछले कुछ वर्षों से जो हो-हल्ला मचा है, उसका कारण यह नही कि किसी की स्वतंत्रता छीनी गई है, बल्कि इसके पीछे टीस यह है कि अब हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक मंच मिल गया है। वह किसी से भी प्रश्न पूछ सकता है। इस नई परिघटना के कारण राजनीति और पत्रकारिता ने दशकों से चली आ रही मठाधीशी ढह गई है और मठाधीश बेचैन हो गए हैं।
सोशल मीडिया के कारण जो ‘फैक्ट चेक मैकेनिज्म’ उभरा है, उससे झूठ की सियासत पर विराम लगने की संभावनाए भी बलवती हुई है। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों को अलग-अलग नजरिए से विश्लेषित किया ही जाएगा। इन सब विश्लेषणों के बीच देखने योग्य एक रोचक बात यह होगी कि सोशल मीडिया के कारण विकसित हुआ फैक्ट चेक मेकैनिज्म चुनावी दृष्टि से कितना कारगर हुआ है।

इंटरनेट पर नए जुड़ने वाले 90 फीसदी पाठक हिंदी के, सिमट रही अंग्रेजी

इंटरनेट पर भाषा के विकास की बात करें तो गूगल की स्टडी बताती है कि 2015 से 2018 के दौरान भारत में 4 करोड़ लोग इंटरनेट से जुड़े हैं। इनमें से 90 फीसदी यूजर ऐसे हैं, जो हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के हैं। गूगल इंडिया की सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर निधि गुप्ता के मुताबिक 2015-16 में हिंदी भाषा के पाठकों में 90 फीसदी का इजाफा हुआ है, जबकि अंग्रेजी के पाठक 19 फीसदी ही बढ़े हैं। यही नहीं गूगल के सभी प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म्स पर अंग्रेजी के बाद हिंदी दूसरे नंबर की भाषा है। वह कहती हैं कि अभी गूगल इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के यूजर्स के लिए सेवाओं, सामग्री और उत्पादों की कमी है। गूगल ने भारतीय भाषाओं के लोगों की बढ़ती मांग को समझा है और जल्दी ही इसमें विस्तार किया जाएगा।

न्यू मीडिया के जानकारों के अनुसार इंटरनेट और फिर स्मार्टफोन के आने के बाद अंग्रेजी का पाठक वर्ग सबसे पहले इस माध्यम से जुड़ा। वजह यह थी कि भारत में अंग्रेजी एलीट वर्ग की भाषा थी और उसकी एक सीमा तक जो ग्रोथ होनी थी, सबसे पहले ही हुई। अब अंग्रेजी के पाठक वर्ग के तौर पर जुड़ने वाले लोग वे ही हैं, जो ऐसे परिवारों की नई पीढ़ी हैं या फिर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त युवा हैं।

कोरोना से मीडिया संस्थान बेहाल, उनकी ही बनाई खबरों से गूगल की चांदी

भले ही दुनिया भर में कोरोना के चलते कारोबार संकट में है और मीडिया संस्थान भी दबाव की स्थिति झेल रहे हैं। इस बीच भी सर्च इंजन गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट ने मोटा मुनाफा कमाया है। 2020 की पहली तिमाही में गूगल के रेवेन्यू में 13 पर्सेंट का इजाफा हुआ है और यह 41.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भले ही बीते 5 सालों में गूगल के रेवेन्यू की सबसे कमजोर ग्रोथ है, लेकिन दुनिया भर में अन्य उद्योगों के मुकाबले कहीं सुंदर तस्वीर है। कंपनी का ऑपरेटिंग प्रॉफिट 8 अरब डॉलर रहा है। दिलचस्प बात यह है कि गूगल की इस कमाई में न्यूज का भी बड़ा हिस्सा रहा है, जिसे वह खुद जनरेट नहीं करता है, लेकिन तमाम मीडिया घरानों की ओर से तैयार खबरों पर उसे यह कमाई हुई है।

बता दें कि फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में सरकारों ने गूगल को आदेश दिया है कि वह समाचारों से होने वाली कमाई को मीडिया संस्थानों के साथ भी साझा करे। हालांकि गूगल की ओर से अब तक इस पर कोई जवाब नहीं दिया गया है, लेकिन अकसर मीडिया संस्थानों की ओर से इस बात को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि आखिर उनकी मेहनत पर होने वाली कमाई अकेले गूगल के हिस्से ही क्यों लगती है? यदि फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में गूगल की ओर सरकार के फैसले को मान लिया जाता है तो यह दुनिया में डिजिटल मीडिया के रेवेन्यू सिस्टम में एक बड़े बदलाव की शुरुआत होगा।