शब्दावली

कीबोर्ड करेज

डिजिटल होती दुनिया में कीबोर्ड करेज एक ऐसी टर्म है, जिसने कम्प्यूटर एवं इंटरनेट उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित किया है। इसके बावजूद सीमित प्रचलन के कारण बहुत से लोग इससे अब तक अनजान ही हैं। कम्यूटर एवं इंटरनेट का उपयोग करने वालों के लिए एक कहावत आमतौर पर उपयोग की जाती है। ’वह हर व्यक्ति ज्यादा हिम्मतवाला होता है, जब वह कीबोर्ड के पीछे छिपकर खुद को अभिव्यक्त कर रहा होता है।’ शब्द कीबोर्ड करेज इसी कहावत को विस्तार से परिभाषित करता है।

कम्यूटर स्क्रीन और कीबोर्ड के माध्यम से बहादुरी दिखाना, जो कि असल जीवन में उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का गुण होता ही नहीं है, कीबोर्ड करेज कहलाता है। इस दौरान वह व्यक्ति इंटरनेट के विभिन्न सोशल मंचों पर लिखते वक्त साहसपूर्ण होने का झूठा दंभ भरता है, जबकि असल जीवन में वह व्यक्ति वैसा बिलकुल भी नहीं होता है।

अपने जीवन के एक उदाहरण को लेकर इसे सरल ढंग समझाने का प्रयास करते हैं। कुछ समय पहले हमने रामायण के रावण को आदर्श रूप में स्थापित करने वाले एक एजेंडे को उद्घाटित करने के लिए श्रृंखला के तहत अपने फेसबुक अकांउट से पोस्ट करना शुरू किया। मेरे एक फेसबुक मित्र को वह नागवारा गुजरा और उन्होंने उस पोस्ट पर कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। जब हद ही हो गई, तो असल जीवन के रिश्ते की परवाह करते हुए हमने वो पोस्ट डिलीट कर दी। उसके कुछ समय बाद उन्हीं मित्र से मिलना हुआ। मन में वही पुरानी बात खटक रही थी तो उनसे पूछ ही लिया। उस पर उनकी शाब्दिक एवं देहभाषा के रूप में मिली प्रतिक्रिया बेहद हैरान करने वाली थी। उस बात पर वह जवाब देने से बच रहे थे और इस तरह दर्शा रहे थे कि मानों सोशल मीडिया पर उस पोस्ट को लेकर दोनों के बीच कुछ हुआ ही नहीं हो। उन्हें मेरे किसी सवाल का जवाब देने का साहस न हुआ। तब मेरे समक्ष उस मित्र के दो चेहरे थे। पहला वो जो सोशल मीडिया पर मैंने देखा था और दूसरा प्रत्यक्षतः मेरे समक्ष मौजूद था। इन दोनों चेहरों के बीच का फर्क कीबोर्ड करेज ही निर्धारित करता है।

आज सूचनाओं के क्षेत्र में फेक न्यूज एक सामान्य सी अवधारणा बन चुकी है। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक दोनों ही इसके शिकार नजर आते हैं। कहना गलत न होगा कि कीबोर्ड करेज ने भी फर्जी खबरों को तैयार करने और उन्हें तेज गति के साथ प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दरअसल किसी भी व्यक्ति के लिए यह मुश्किल होता है कि वह दूसरे व्यक्ति के सामने जाकर कोई झूठ बोल दे। इसके उलट एक कीबोर्ड और कम्प्यूटर स्क्रीन की मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के बीच झूठ फैलाना कहीं सरल काम है। झूठ को फैलाने का मकसद पूरा होने या फिर झूठ पकड़े जाने पर किसी तरह की कार्रवाई से बचने के लिए अकसर उसे इंटरनेट से हटा भी दिया जाता है। मगर अपनी अप्रत्याशित गति के कारण वह झूठ तब तक बहुत सा नुकसान पहुंचा चुका होता है।

फेक न्यूज फैलाने के अलावा कीबोर्ड करेज का सबसे ज्यादा नुकसान सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों को हुआ है। तर्क-वितर्क का यह ऑनलाइन मंच सबको अपनी बात रखने का समान अवसर देता है। संवाद को सार्थक बनाने वाली यही खासियत बहुत से मामलों में मुश्किलें भी पैदा कर देती है। इसका सबसे बड़ा कारण है असहमतियां। असहमतियां होना गलत नहीं है। असहमतियों में ही तो संवाद की खूबसूरती छिपी होती है। लेकिन जब हम अपनी असहमतियों की तरह दूसरों की असहमतियों का सम्मान करना भूल जाते हैं, तो टकराव की स्थिति पैदा होती है। ऊपर से कीबोर्ड करेज वैसे भी मनोवैज्ञानिक साहस तो प्रदान कर ही रहा होता है। यहीं से शुरू होता है ट्रोलिंग, निजी हमलों, घटिया एवं गैर जिम्मेदार टिप्पणियों और लानत-मलानत का सिलसिला। वैसे तो साहसी होना एक सकारात्मक गुण है, लेकिन वर्णित कमियों के कारण कीबोर्ड करेज एक अवगुण माना जाता रहा है।

हालांकि हर व्यक्ति, वस्तु या विचार का नकरात्मक के साथ-साथ कोई न कोई सकारात्मक गुण भी होता है। कीबोर्ड करेज का भी एक महत्वपूर्ण गुण है। समाज में बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें खुद को अभिव्यक्त करने का मौका नहीं मिल पाता। इसके कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों के जीवन में कुछ न कुछ ऐसा घटा होता है, जो उनके कहने का साहस छीन लेता है। वे लोग उस दबाव तले इस कदर दब जाते हैं कि फिर अपनी बात बोलकर सबके सामने रखने में खुद को असमर्थ सा महसूस करते हैं। कुछ लोग ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं, जो घर में सबसे छोटे होते हैं। उन्हें अकसर अपनी बात रखने का मौका नहीं मिल पाता। कीबोर्ड करेज इन गुमनाम आवाजों को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम बना है। इस साहस के कारण यह वर्ग संवाद की प्रक्रिया में शामिल हो सका है।

कीबोर्ड करेज और एल्कोहोल में एक बड़ी खास समानता है। दोनों ही चीजें व्यक्ति को कृत्रिम साहस प्रदान करती हैं और दोनों के ही उपभोग में एक सीमा आती है जब ये विनाशकारी बन जाते हैं। कीबोर्ड करेज संवाद के क्षेत्र में उपयोगी साबित हो सकता है यदि इसका इस्तेमाल निजी हमलों या आपसी टकराव के बजाय सृजनात्मक एवं रचनात्मक कार्यों में किया जाए। बेहतर हो कि यदि किसी विषय पर लोगों के दिलो-दिमाग में असहमतियां हैं, तो सम्मानपूर्वक ढंग से सुलझाने की खुद में हिम्मत पैदा करें। तभी वह उपयोगी है, फिर चाहे वह साहस कोई सा भी हो।

मिलेनियल्स

सामान्य प्रचलन में एक मान्यता है कि हर तीस वर्ष के अंतराल पर एक नई पीढ़ी आकार लेती है। मिलेनियल्स शब्द भी एक निश्चित अवधि के दौरान जन्म लेने वाली पीढ़ी को रिपरजेंट करता है। यह शब्द 1987 से प्रचलन में है। मिलेनियल्स को इन्फोर्मेशन एज नेट जेनरेशन इको बूमर्ज जेनरेशन नेक्सट आदि कई दूसरे नामों से भी जाना जाता है। यूएस के सेंसस ब्यूरो यानी जनगणना के आंकड़ों की मानें तो इस वक्त दुनिया की एक चौथाई आबादी मिलेनियल्स की है। आसान भाषा में आप इसे युवा आबादी कह सकते हैं। 1980 या 82 से साल से लेकर 2000 के बीच जो लोग पैदा हुए हैं यानी 21वीं सदी की शुरूआत में वयस्क हुए हैं, उन्हें मिलेनियल्स कहा जाता है। भारत में आमतौर से जिन्हें आजकल के बच्चे या आजकल के जवान कह दिया जाता है। कुछ समय पहले यह शब्द काफी सुर्खियों में था और सोशल मीडिया पर भी इसके पक्ष और विरोध में एक लंबी बहस हुई थी। यह शब्द तब एकाएक काफी लोकप्रिय हो गया था जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटोमोबाइल सेक्टर में आई जबरदस्त मंदी को लेकर बयान दिया कि मिलेनियल्स की सोच बदली है और वो ओला और उबर जैसी प्राइवेट टैक्सी के इस्तेमाल पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।

मोटे तौर पर मिलेनियल्स की अवधारणा सात मुख्य बिंदुओं को स्पर्श करती है। ये सात बिंदु हैं- संस्कृति, प्रेरणा, नवाचार, डिजिटल तकनीकी, सहभागिता, ज्ञानार्जन और नेतृत्व। मिलेनियल्स के प्रतिनिधि ये युवा संचार के युग में डिजिटल और वास्तविक जीवन में ज्यादा कुशल और तेज हैं। सामाजिक व सामुदायिक शैली के जीवन वाले ये युवा वैयक्तिक स्वतंत्रता को तरजीह देते हैं। ये युवा ज्यादा संतुलन और बेहतर स्वास्थ्य वाली जीवन शैली चाहते हैं। अपने और समाज के लिए और बेहतर व अनुकूल प्रॉडक्टस की डिमांड करते हैं। संपर्क एवं सुविधा के लिए इन युवाओं में ज्यादा ललक है। कुल मिलाकर ये युवा अपनी पिछली पीढ़ियों की तुलना में तकनीक विज्ञान और समझ को लेकर बेहतर और तेजतर हैं इसलिए इन्हें जेन एक्स या जेन वाय जैसे शब्द भी मिल चुके हैं। लेकिन इन आधुनिक खूबियों के बावजूद इसकी आलसी जल्दबाज और कम या न विचार करने वाली यानी दूर की न सोचने वाली पीढ़ी कहकर आलोचना भी होती रही है।

भारत में इस शब्द पर अब तक ज्यादा अध्ययन नहीं हुआ है, इसलिए बहुतों के लिए यह एक नई टर्म हो सकती है। दुनिया के कई हिस्सों में खासकर पश्चिम में मिलेनियल्स वाली अवधारणा पर काफी अध्ययन हो चुका है। इसलिए वहां की मिलेनियल्स आबादी को लेकर ज्यादा सुनने-पढ़ने को मिलता है। विकसित देशों में इस जेनरेशन में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि ये परिवारों सामाजिक संस्कारों और जीवन के पुराने मूल्यों की कद्र नहीं करते। यह प्रवृत्ति भारत में भी धीरे-धीरे उभरने लगी है। इसके बावजूद भारतीय मिलेनियल्स के बारे में यह राय नहीं बनाई जा सकती। भारत की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस श्रेणी में आता है। तकनीकी का अधिकतम उपयोग भले ही इसे पसंद होए लेकिन सामाजिक मूल्यों से अभी भी यह गहरे तक जुड़ा हुआ है। दुनिया की तुलना में भारत की यह आबादी आलसी या गफलत की शिकार नहीं कही जा सकती। यहां माता-पिता अभिभावकों या बड़े-बुजुर्गों को लेकर मिलेनियल्स में एक चिंता और समझ के साथ उन्हें साथ लेकर चलने की सोच कायम है। इन्हें जिम्मेदारी का बखूबी एहसास है और मूल्यों की फिक्र है। इन मूल्यों के साथ ही तकनीक विज्ञान और कौशल के गुणों से भरपूर यह पीढ़ी ज्यादा ईमानदार और बेहतर व्यवस्था की पक्षधर दिखती है।

रेजिना लटरेल और कैरेन मैकग्रा लिखित दि मिलेनियल माइंडसेटस् ऐसी ही एक किताब है, जिसमें न सिर्फ इस पीढ़ी के कई लोगों, बल्कि पुरानी पीढ़ियों के कुछ लोगों से बातचीत कर दो जेनरेशन के बीच में एक आपसी समझ बनाने की दिशा में कोशिश की गई है। मिलेनियल शब्द को और गहराई से समझने के लिए इसी तरह का एक प्रयास भारत में भी हुआ है। सुब्रह्मण्यम एस कलापति ने दि मिलेनियल्स-एक्सप्लोरिंग दि वर्ल्ड ऑफ दि लारजेस्ट लिविंग जेनरेशनस् में इस दिशा में बहुत बढ़िया काम किया है।

मिलेनियल जेनरेशन ने हमारे जीवन, कामकाज के तौर-तरीकों और मूल्यों को प्रभावशाली ढंग से प्रभावित किया है। मिलेनियल्स शब्द सिर्फ एक पीढ़ी का नहीं, बल्कि एक पूरी सोच में परिवर्तन को इंगित करता है। भारतीय युवा अगर सांस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों से जुड़ा रहकर तकनीकी विकास को अपनाएं तो इस वर्ग में देश को आगे ले जाने की अपार संभावनाएं हैं।

वेबीनार

कोरोना महामारी के दौरान जब देश-दुनिया के अधिकतर लोग घर से ही काम कर रहे हैं, तो अपने दैनिक कामकाज निपटाने में इंटरनेट काफी मददगार साबित हो रहा है। इंटरनेट नई-नई चीजें सीखने के लिए युवा और पुरानी पीढ़ी के लोगों के लिए अब एक प्लेटफार्म बन गया है। इसने लोगों को एक मंच प्रदान किया है, जहां वे तेजी से संपर्क कर सकते हैं और तुरंत कोई भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसी क्रम में हाल के समय में एक नई तकनीक विकसित की गई है, जिसका नाम है वेबीनार। वेबीनार दो शब्दों के मेल से बना है, वेब यानी वेब आधारित और सेमीनार यानी संगोष्ठी। वेब आधारित संगोष्ठी को ही वेबीनार कहते हैं। वेबीनार के द्वारा इंटरनेट के माध्यम से लाइव बैठक या प्रस्तुतिकरण का संचालन किया जाता है। इसमें वेब कॉन्फ्रेंसिंग तकनीकों का सहारा लेकर आप वीओआईपी से जुड़े क्रियाकलाप जैसे व्याख्यान, प्रजेंटेशन को उपलब्ध करवा सकते हैं। इसके लिए आपको सिर्फ जरूरत है - एक कंप्यूटर और एक इंटरनेट कनेक्शन की और फिर, आप दुनिया भर में लोगों से तुरंत संपर्क कायम कर सकते हैं और दुनिया में कहीं भी चर्चा और सेमिनार आयोजित कर सकते हैं। इस प्रकार संवाद के नए सेतु बांधने में वेबीनार का महत्व लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
वेबीनार तकनीक के कई ऐसे लाभ हैं, जिसके कारण आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण बन चुकी है। लचीलापन इस तकनीकी का सबसे बड़ा लाभ है। वेबीनार लोगों को अपने घर, किसी कैफे या जहां भी किसी व्यक्ति को सुविधा हो ऐसे किसी अन्य स्थान से संगोष्ठी का आयोजन करने की अनुमति देता है। इसके लिए केवल एक विशिष्ट समय निर्धारित करने और सारे प्रासंगिक ऑडियंस को सूचित करने की जरूरत है। एक बार जब आप वेबीनार की तारीख, समय और ऐसे अन्य आवश्यक प्वाइंट्स का विवरण साझा कर देते हैं, तो अधिक संख्या में लोग उस वेबीनार में शामिल हो सकते हैं। दूसरा, इस तकनीक के जरिए दूर-दूर फैले बहुत बड़ी संख्या में लोगों द्वारा भी एकसाथ सेमीनार को अटेंड किया जा सकता है। स्काइप और गूगल ड्यूओ जैसे वीडियो कॉलिंग सॉफ्टवेयर व्यक्तिगत उपयोग के लिए अच्छे हैं, लेकिन, पेशेवर कार्यक्रमों के लिए कोई बड़ा प्लेटफार्म चाहिए और उस समय वेबीनार के वास्तविक उपयोग और महत्व का पता चलता है।
इस तकनीक का तीसरा लाभ बेहतर संवाद का है। वेबीनार वक्ता और श्रोताओं के बीच बेहतर इंटरेक्शन की सुविधा देता है, क्योंकि यह सभी लोगों को समान स्तर पर लाता है। आप वेबीनार के दौरान अपने प्रश्न बोलकर या लिखकर पूछ सकते हैं या फिर, लाइव सेमिनार खत्म हो जाने के बाद आप ई-मेल के माध्यम से अपने प्रश्न पूछ सकते हैं। वेबीनार को चैथा लाभ सेशन रिकॉर्डिंग प्राप्त करने की सुविधा से जुड़ा है। कुछ वेबीनार होस्ट या ऑर्गेनाइजर्स अपने सभी उपस्थित मेम्बर्स को सेशन की रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध करवाते हैं, ताकि मेम्बर्स बाद में अपनी सुविधा के अनुसार इस रिकॉर्डिंग से लाभ उठा सकें। यदि किसी कारणवश कोई सेशन अटेंड नहीं कर पाते हैं, तो आप होस्ट से उस सेशन की रिकॉर्डिंग प्राप्त कर सकते हैं।
वेबीनार से मिलता-जुलता एक शब्द वेबकास्ट भी आपने सुना ही होगा। तकनीकी क्षेत्र ये जुड़े ये दोनों शब्द शब्द एक से ही प्रतीत होते हैं, लेकिन इन दोनों में बहुत ज्यादा अंतर है। वेबकास्ट रेडियो या टीवी प्रसारण की तरह होता हैं, जिसमें पारस्परिक आदान-प्रदान एकतरफा होता है। इसमें ऑडियंस की भूमिका बेहद सीमित होती है। दूसरी तरफ वेबीनार ज्यादा संवादात्मक होता है। यहां श्रोता, वक्ता के व्याख्यान के दौरान ही अपने सवाल पूछ सकता या अपनी राय दे सकता है। गूगल हैंगआउट्स, वेबीनार ऑन एयर, स्काइप, गो टू वेबीनार, सिस्को वेबएक्स, एडोब कनेक्ट, मेगा मीटिंग, रेडी टॉक, एनी मीटिंग, ऑन स्ट्रीम वेबीनार आयोजित करने के लिए कुछ अच्छे सॉफ्टवेयर हैं।

साइऑप्स (साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज)

साइऑप्स यानी साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज विभिन्न कालखंडों में युद्ध कला का एक बेहद प्रभावी और लोकप्रिय प्रारूप रहा है। अभी हाल ही में भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में जिस तरह का टकराव देखने को मिला, वहां दोनों देशों ने अपने-अपने स्तर पर इस हथियार का इस्तेमाल करने का प्रयास किया। साइऑप्स ऐसी लड़ाई है जो मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा लड़ी जाती है। इसका उद्देश्य दुश्मन के अंदर सुनियोजित ढंग से मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया को उद्घटित करना होता है, ताकि हथियारों की लड़ाई के पहले ही दुश्मन का मनोबल तोड़ दिया जाए। इतिहास के पन्ने पलटने पर आप पाएंगे कि प्राचीन काल से ही लोग मनोवैज्ञानिक युद्ध करते आ रहे हैं। कुछ ऐतिहासिक लड़ाइयों के जरिए इस अवधारणा को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
फारसियों और मिस्र के लोगों के बीच 525 ईसा पूर्व में लड़ी गई पेलुसियम की लड़ाई मनोवैज्ञनिक रूप से लड़ी गई थी। मिस्र के लोग बिल्लियों की पूजा करते थे। यह बात फारसी जानते थे। वह बिल्ली को सेना के आगे करते ताकि मिस्र वाले उन पर वार ना कर दें। वह लड़ाई अंततः फारिसयों ने हथियारों से नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध द्वारा जीती थी। मंगोल के सेनापति चंगेज खान का नियम था कि पहले गांव को जलाकर राख करके दूसरे गांवों का मनोबल तोड़ा जाए, ताकि उनमें लड़ने की क्षमता ही न बचे। अगर एक गांव के सब लोगों को मार दिया तो आगे वाले गांव के लोग बिना लड़े ही हथियार डाल देते थे। भारत में मुगलों के राज का भी कमोबेश यह एक बड़ा कारण रहा है। भारत के भी कई राजा-महाराजा मुगलों से मनोवैज्ञानिक युद्ध की वजह से ही हारे। भारत पर करीब 200 वर्षों तक शासन करने वाले अंगे्रजों ने भी इसी नीति का अनुसरण किया था। आधुनिक युग में लड़े जा रहे युद्ध भी इसी नीति को आधार बनाकर लड़े जा रहे हैं। अमेरिका में अक्सर हर लड़ाई के पहले प्रोपे्रगेंडा फैलाया जाता है। विश्व के इतिहास में हर जीतने वाले ने मनोविज्ञान के आधार पर अधिकतर अपने दुश्मन का मनोबल तोड़ा है। यही है मनोवैज्ञानिक लड़ाई। यदि गहराई से देखा जाए, तो सारे युद्ध मनोवैज्ञानिक ही होते हैं, क्योंकि दिखने वाली हार जीत युद्ध की योजना और उसके सफल क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। युद्ध विद्या के जानकार मानते हैं कि युद्ध के निर्णय पहले ही तय हो जाते हैं। सामान्य व्यक्ति को वह युद्ध के परिणाम बाद में दिखाई पड़ते हैं। ऐसे ही एक युद्ध विचारक सून जू ने अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ वार’ में लिखा है -समस्त युद्धों में विजय का मूल भ्रम है। युद्ध की विभिन्न रणनीतियों में शत्रु के दिमाग को पढ़कर उसके विपरीत योजना बनाना और उसे लागू करना यही युद्ध का मनोवैज्ञानिक पहलू है।
कोई ज्यादा वक्त नहीं बीता है जब कश्मीर में जारी अशांति के मद्देनजर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा था कि साइबर जगत में लड़ा जाने वाला ’मनोवैज्ञानिक युद्ध’ हमारे समय का नया खतरा बन चुका है। उन्होंने नए युग के इस युद्ध में मुकाबला करने के लिए लोगों से ’सोशल मीडिया सैनिक’ बनने का अनुरोध किया था। इसके साथ ही उन्होंने इस हकीकत को भी जोर देकर बयां किया था कि मौजूदा समय में दुनिया हैरतअंगेज गति के साथ बदल रही है। पहले पारंपरिक युद्ध होते थे, फिर परमाणु युद्ध हुए और फिर लिमिटेड इन्टेंसिटी वार (जैसे करगिल युद्ध) हुआ। लेकिन आज का खतरा साइबर युद्ध है और वह भी इस मनोवैज्ञानिक युद्ध के जरिए।
मनोवैज्ञानिक युद्ध की मारकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने संकेत किया कि विश्व के जीवित जंग के मैदानों के रूप में प्रसिद्ध राजौरी तथा पुंछ के जिलों में गोलियां इतनी प्रभावशाली नहीं होतीं, जितना कि मानसिक स्तर पर लड़े जाना वाला युद्ध। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर जवान मानसिक स्तर पर अपने आप पर तथा दुश्मन पर विजय हासिल कर लेता है, तो वह आप तो सुरक्षित रहता ही है, अपने साथियों को भी इस आग से बचाए रखता है। इसी मानसिक युद्ध, जिसे मनोवैज्ञानिक युद्ध भी कहा जा सकता है, के कारण ही आज भारतीय सैनिक पाकिस्तानी सेना पर विजय हासिल किए हुए हैं इस सच्चाई के बावजूद कि पाक सेना ने इन दोनों सेक्टरों में अधिकतर ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर रखा है। गोलियों की बरसात और पाक सैनिकों द्वारा समय-समय पर परिस्थितियों को भयानक बनाने की कोशिशों के बावजूद भारतीय सैनिक अपना मनोबल नहीं खोते हैं। यह सब इसलिए होता है, क्योंकि वे मनोवैज्ञानिक युद्ध में सफलता के झंडे गाढ़ चुके होते हैं। यही कारण है कि नियंत्रण रेखा पर कई स्थानों पर पाकिस्तानी तथा भारतीय सीमा चैकियों में अंतर 100 फुट से भी कम है, लेकिन क्या मजाल पाक सैनिक की कि अपने सामने वाले पर गोलियां दाग सकें।
इतिहास के झरोखे में झांककर देखें तो भारतीय सभ्यता बार-बार बाहरी विचारधाराओं का प्रभाव में आई और लगभग हर विचारधारा ने इसके मनोविज्ञान को प्रभावित करने को प्रयास किया। बंटवारे से पहले हिन्दुओं को बाहरी देशों से आये इस्लाम और इसाई धर्मों से अपने देश को बचाने के लिये संघर्ष करना पड़ता था, किन्तु बंटवारे के पश्चात् विदेशी धर्मों के अतिरिक्त विदेशी आर्थिक शक्तियों से भी जूझना पड़ रहा है, जो हिन्दू जीवनशैली की विरोधी हैं।
दूसरी तरफ विश्व भर से भारत के खिलाफ सक्रिय राजनीतिक मिशन पड़ोसी देशों में युद्ध की स्थितियां और कारण उत्पन्न करते रहे हैं, ताकि विकसित देशों के लिये उन देशों को युद्ध का सामान और हथियार बेचने हेतु बाजार उपलब्ध रहे। एक देश के हथियार खरीदने के पश्चात् उसका विरोधी भी हथियार खरीदेगा और यह क्रम चलता ही रहेगा।
दूसरे देशों पर नियंत्रण रखने की भावना से कार्य कर रही ये ताकतें लक्षित देश की तकनीक को विकसित नहीं होने देतीं और उसमें किसी ना किसी तरह से रोड़े अटकाती रहती हैं। देशभक्त नेताओं की गुप्त रूप से हत्या या उनके विरुद्ध सत्ता पलट भी करवाते हैं। इस प्रकार के सभी यत्न गोपनीय क्रूरता से करे जाते हैं। उनमें भावनाओं अथवा नैतिकताओं के लिये कोई स्थान नहीं होता। इसी को ‘कूटनीति’ कहते हैं। कूटनीति में लक्षित देशों की युवा पीढी को देश के नैतिक मूल्यों, रहन सहन, संस्कृति, आस्थाओं के खिलाफ भटकाकर अपने देश की संस्कृति का प्रचार करना तथा युवाओं को उसकी ओर आकर्षित करना भी शामिल है, जिसे मनोवैज्ञानिक युद्ध कहा जाता है। यह बहुत सक्षम तथा प्रभावशाली साधन है। इसका प्रयोग भारत के खिलाफ आज धड़ल्ले से हो रहा है। इस नीति से समाज के विभिन्न वर्गों में विवाद तथा विषमतायें बढ़ने लगती हैं तथा देश टूटने के कगार पर पहुंच जाता है।
आमने-सामने की जंग के अलावा भी कई अन्य क्षेत्रों में मनोवैज्ञानिक युद्ध छिड़ा हुआ है। इसके जरिए विकसित देश अपने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के साथ-साथ बाजार के विस्तार में जुटे हुए हैं। इसके लिए इन्होंने आज ऐसी कई कपटी विधियां ईजाद कर ली हैं, जो अल्पविकसित या भारत जैसे विकासशील देशों की जनता, खासकर युवा वर्ग के मनोविज्ञान को मनमाफिक सांचे में ढाल रही हैं। इस पूरे खेल में ब्रांड एम्बेसेडरों तथा रोल माॅडलों की सहायता से पहले अविकसित देश के उपभोक्ताओं की दिनचर्या, जीवन-पद्धति, रुचि, सोच-विचार, सामाजिक व्यवहार की परम्पराओं तथा धार्मिक आस्थाओं में परिवर्तन किये जाते हैं, ताकि वह घरेलू उत्पादों को नकार कर नये उत्पादों के उपयोग में अपनी ‘शान’ समझने लगें। युवा वर्गों को अर्थिक डिस्काउंटस, उपहार, नशीली आदतों, तथा आसान तरीके से धन कमाने के प्रलोभनांे आदि से लुभाया जाता है, ताकि वह अपने वरिष्ठ साथियों में नये उत्पादों के प्रति जिज्ञासा और प्रचार करें। इस प्रकार खानपान तथा दिखावटी वस्तुओं के प्रति रुचि जागृत हो जाती है। स्थानीय लोग अपने आप ही स्वदेशी वस्तु का त्याग करके उसके स्थान पर बाहरी देश के उत्पादों को स्वीकार कर लेते हैं। इस प्रकार घरेलू बाजार विदेशियों का हो जाता है। कोकाकोला, फेयर एण्ड लवली, लोरियाल आदि ब्रांड्ज की भारत में आजकल भरमार इसी अर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध के कारण है।
ऐसा ही एक युद्ध भारत की सनातन परंपराओं का दुष्प्रचार करने हेतु छेड़ा गया है। भारतीय संतों के खिलाफ दुष्प्रचार के लिये स्टिंग ऑपरेशन, साधु-संतों के नाम पर यौन शोषण के उल्लेख, नशीले पदार्थों का प्रसार और फिर ‘भगवा आतंकवाद’ का दोषारोपण किया जाता है। अकसर इन प्रसार माध्यमों का प्रयोग हमारे चुनावों के समय में हिन्दू विरोधी सरकार बनवाने के लिये किया जाता है। भारत के अधिकतर मुख्य प्रसार माध्यम ईसाइयों, धनी अरब शेखों या अन्य हिन्दू विरोधी गुटों के हाथ में हैं, जिनका इस्तेमाल हिन्दू विरोध के लिये किया जाता है। भारत सरकार धर्मनिरपेक्षता के बहाने कुछ नहीं करती। अवैध घुसपैठ को बढ़ावा देना, मानवाधिकारों की आड़ में उग्रवादियों को समर्थन देना तथा हिन्दू आस्थाओं के विरुद्ध दुष्प्रचार करना आजकल मीडिया का मुख्य लक्ष्य बन चुका है। नकारात्मक समाचारों को छापकर वे सरकार और न्याय-व्यवस्था के प्रति जनता में अविश्वास और निराशा की भावना को भी उकसा रहे हैं। हिन्दू धर्म की विचारधारा को वह अपने स्वार्थों की पूर्ति में बाधा समझते हैं। कॉन्वेन्ट शिक्षित युवा पत्रकार उपनिवेशवादियों के लिये अग्रिम दस्तों का काम कर रहे हैं। सनातन परंपराओं के खिलाफ लड़ा जा रहा यह युद्ध भी प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मनोवैज्ञानिक आधार पर ही लड़ा जा रहा है।
इस प्रकार अलग-अलग कालखंडों में रूप बदलकर साइकोलॉजिकल ऑपरेशन्ज, युद्ध क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। मनोविज्ञान को आधार बनाकर लड़े जाने वाले इस प्रकार के युद्ध में सूचनाएं प्रमुख भूमिका में रहती हैं। भारत के विरोध में उतरी इन फौजों द्वारा छेड़े गए युद्ध अंततः उन्हें परास्त करने हेतु जरूरी है कि हर भारतीय न केवल इन षड्यंत्रों को समझे, बल्कि उन्हें परास्त करने के लिए एक प्रभावी तैयारी करे।

मोजो की मौजभरी पत्रकारिता

समाज के अन्य क्षेत्रों की ही तरह मीडिया क्षेत्र तकनीकी विकास से गहरे से प्रभावित हुआ है। हाल के समय में तकनीकी विकास मीडिया क्षेत्र में जो कुछ बड़े बदलाव लेकर आया है, उन्हीं में से एक है मोबाइल जर्नलिज्म। मोबाइल जर्नलिज्म पत्रकारिता का वह स्वरूप है जिसमें आवश्यक उपकरणों एवं व्यावसायिक प्रसारण की गुणवत्ता से लैस मोबाइल मल्टीमीडिया स्टूडियो के जरिए खबरों को कवर किया जाता है। मोबाइल जर्नलिज्म में मोजो किट की मदद से किसी खबर से संबंधित शूटिंग, रिकॉर्डिंग, सम्पादन और इसके वितरण का कार्य किया जाता है। इसके अलावा अगर किसी एक्सक्लूसिव खबर को कवर किया जाना है तो मोजो किट लाइव स्ट्रीमिंग के कार्य में एक बेहतरीन विकल्प के रूप में उपयोगी साबित हो रहा है। मोजो किट के जरिए एक्सिक्लूसिव खबरों को लाइव स्ट्रीमिंग से न्यूज रूम में शेयर किया जाता है और फिर वहां से खबर को टीवी चैनल पर प्रसारित किया जा सकता है।
मोबाइल जर्नलिज्म के शुरू होने के बाद स्मार्टफोन केवल मोबाइल बनकर कर नहीं रह गया है बल्कि मीडिया कवरेज में इसने खुद को एक उपयोगी उपकरण के रूप में स्थापित कर लिया है। डिजिटल होती मीडिया दुनिया में मोबाइल जर्नलिज्म ने ग्राउंड रिपोर्टिंग के क्षेत्र को विस्तृत बनाने के साथ-साथ सरल भी बना दिया है। इस आविष्कार ने रिपोर्टिंग के लिए परंपरागत मीडिया के भारी-भरकम उपकरणों को जगह-जगह ढोने की मजबूरियों से मुक्ति दिलाई है। मोबाइल जर्नलिज्म दोनों ही तरह के पत्रकारों के लिए मददगार साबित हो रही है। चाहे वे पेशेवर पत्रकार हों या शौकिया पत्रकार।
मीडिया में समय का अपना खास महत्व रहा है। किसी भी खबर की उपयोगिता तभी है जब उसे समय पर लक्षित समूह तक पहुंचाया जाए। पहले के समय में मीडिया नेटवर्क की अपनी एक सीमित पहुंच होती थी और उस क्षमता के साथ हर खबर को समय पर कवर कर पाना संभव नहीं था। हरसंभव प्रयास के बाद भी कई खबरें छूट जाती थीं लेकिन मोबाइल जर्नलिज्म और मोजो किट के माध्यम से सीमित संसाधनों एवं नेटवर्क की चुनौती से निपटने में मीडिया ने काफी हद तक सफ लता हासिल की है। मोजो की खूबियों के कारण तमाम मीडिया हाउस न केवल इसके महत्व को स्वीकार करने को बाध्य हैं बल्कि अपने लिए इसकी उपयोगिता को देखकर उन्होंने इसे प्रोत्साहित भी किया है।
अगर बात करें मोबाइल जर्नलिज्म के लिए जरूरी उपकरणों की तो एक बढिय़ा क्वालिटी के मोबाइल के जरिए इस कार्य को अंजाम दिया जा सकता है। हालांकि मोबाइल जर्नलिज्म में पेशेवर दक्षता और गुणवत्ता जैसे मूल्यों को शामिल करना है तो इसमें मोजो किट काफी मददगार साबित हो सकती है। इस किट में आम तौर पर ट्राइपॉड, शॉटगन माइक्रोफोन, एल.इ.डी. ऑडियो एडेप्टर, माइक्रोफोन केबल, माइक्रोफोन एक्सटेंशन केबल, पोर्टेबल पावर बैंक, मोबाइल हेडफोन जैसे आवश्यक उपकरण शामिल रहते हैं। मोजो किट की मदद से कवरेज को किसी पेशेवर वीडियोग्राफ र की ही तरह अंजाम दिया जा सकता है। यह उपकरण या किट आज तमाम ऑनलाइन रिटेलर कंपनियां किफायती दामों पर उपलब्ध करवा रही हैं। सबसे आगे, सबसे तेज की राह पर अग्रसर मीडिया जगत में नि:संदेह मोजो एक प्रभावी उपकरण बनकर उभरा है। हालांकि इसकी अपनी कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे आगे निकलने की होड़ में या शौकिया तौर पर पत्रकारिता क्षेत्र में प्रवेश करने वाले लोगों द्वारा अस्पष्ट, आधी-अधूरी या फि र गलत सूचनाएं भेजने की हर समय आशंका बनी रहती है। इसके अलावा हल्के मोबाइल या सहायक उपकरण किसी खबर की कवरेज की व्यावसायिक गुणवत्ता वाली अपेक्षाओं को पूरा करने में अक्षम रहते हैं। इन चुनौतियों से यदि प्रभावी ढंग से पार पा लिया जाए तो मोबाइल जर्नलिज्म की विश्वसनीयता और उपयोगिता को बढ़ाया जा सकता है। मोजो के क्षेत्र में नागरिक जागरूकता एवं भागीदारी को बढ़ाने के साथ मीडिया हाउस और शिक्षण संस्थान अगर इस क्षेत्र से जुडऩे के इच्छुक लोगों के शिक्षण प्रशिक्षण के प्रयास करें तो अभिलषित परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।